Romans 152017

1निदान हम बलवानों को चाहिए, कि निर्बलों की निर्बलताओं को सहें, न कि अपने आप को प्रसन्‍न करें।

2हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उसकी भलाई के लिये सुधारने के निमित्त प्रसन्‍न करे।

3क्‍योंकि मसीह ने अपने आप को प्रसन्‍न नहीं किया, पर जैसा लिखा है, “तेरे निन्‍दकों की निन्‍दा मुझ पर आ पड़ी।”

4जितनी बातें पहिले से लिखी गईं, वे हमारी ही शिक्षा के लिये लिखी गईं हैं कि हम धीरज और पवित्र शास्‍त्र की शान्‍ति के द्वारा आशा रखें।

5और धीरज, और शान्‍ति का दाता परमेश्‍वर तुम्‍हें यह बरदान दे, कि मसीह यीशु के अनुसार आपस में एक मन रहो।

6ताकि तुम एक मन और एक स्वर होकर हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्‍वर की बड़ाई करो।

7इसलिये, जैसा मसीह ने भी परमेश्‍वर की महिमा के लिये तुम्‍हें ग्रहण किया है, वैसे ही तुम भी एक दूसरे को ग्रहण करो।

8मैं कहता हूँ, कि जो प्रतिज्ञाएँ बापदादों को दी गई थीं, उन्‍हें दृढ़ करने के लिये मसीह, परमेश्‍वर की सच्‍चाई का प्रमाण देने के लिये खतना किए हुए लोगों का सेवक बना।

9और अन्‍यजाति भी दया के कारण परमेश्‍वर की बड़ाई करें, जैसा लिखा है, “इसलिये मैं जाति जाति में तेरा धन्‍यवाद करूँगा, और तेरे नाम के भजन गाऊँगा।”

10फिर कहा है, “हे जाति जाति के सब लोगों, उसकी प्रजा के साथ आनन्‍द करो।”

11और फिर, “हे जाति जाति के सब लोगों, प्रभु की स्‍तुति करो; और हे राज्‍य राज्‍य के सब लोगो; उसे सराहो।”

12और फिर यशायाह कहता है, “यिशै की एक जड़ प्रगट होगी, और अन्‍यजातियों का हाकिम होने के लिये एक उठेगा, उस पर अन्‍यजातियाँ आशा रखेंगी।”

13सो परमेश्‍वर जो आशा का दाता है तुम्‍हें विश्‍वास करने में सब प्रकार के आनन्‍द और शान्‍ति से परिपूर्ण करे, कि पवित्रआत्‍मा की सामर्थ से तुम्‍हारी आशा बढ़ती जाए।

14हे मेरे भाइयो; मैं आप भी तुम्‍हारे विषय में निश्‍चय जानता हूँ, कि तुम भी आप ही भलाई से भरे और ईश्‍वरीय ज्ञान से भरपूर हो और एक दूसरे को चिता सकते हो।

15तौभी मैं ने कहीं कहीं याद दिलाने के लिये तुम्‍हें जो बहुत हियाव करके लिखा, यह उस अनुग्रह के कारण हुआ, जो परमेश्‍वर ने मुझे दिया है।

16कि मैं अन्यजातियों के लिये मसीह यीशु का सेवक होकर परमेश्‍वर के सुसमाचार की सेवा याजक की नाई करूँ; जिस से अन्‍यजातियों का मानों चढ़ाया जाना, पवित्र आत्‍मा से पवित्र बनकर ग्रहण किया जाए।

17सो उन बातों के विषय में जो परमेश्‍वर से सम्‍बन्‍ध रखती हैं, मैं मसीह यीशु में बड़ाई कर सकता हूँ।

18क्‍योंकि उन बातों को छोड़ मुझे और किसी बात के विषय में कहने का हियाव नहीं, जो मसीह ने अन्‍यजातियों की अधीनता के लिये वचन, और कर्म।

19और चिन्‍हों और अदभुत् कामों की सामर्थ से, और पवित्र आत्‍मा की सामर्थ से मेरे ही द्वारा किए: यहाँ तक कि मैं ने यरूशलेम से लेकर चारों ओर इल्‍लुरिकुम तक मसीह के सुसमाचार का पूरा पूरा प्रचार किया।

20पर मेरे मन की उमंग यह है, कि जहाँ जहाँ मसीह का नाम नहीं लिया गया, वहीं सुसमाचार सुनाऊँ; ऐसा न हो, कि दूसरे की नेव पर घर बनाऊँ।

21परन्‍तु जैसा लिखा है, वैसा ही हो, “जिन्‍हें उसका सुसमाचार नहीं पहुँचा, वे ही देखेंगे और जिन्‍हों ने नहीं सुना वे ही समझेंगे।”

22इसी लिये मैं तुम्‍हारे पास आने से बार बार रूका रहा।

23परन्‍तु अब मुझे इन देशों में और जगह नहीं रही, और बहुत वर्षों से मुझे तुम्‍हारे पास आने की लालसा है।

24इसलिये जब इसपानिया को जाऊँगा तो तुम्‍हारे पास होता हुआ जाऊँगा क्‍योंकि मुझे आशा है, कि उस यात्रा में तुम से भेंट करूँ, और जब तुम्‍हारी संगति से मेरा जी कुछ भर जाए, तो तुम मुझे कुछ दूर आगे पहुँचा दो।

25परन्‍तु अभी तो पवित्र लोगों की सेवा करने के लिये यरूशलेम को जाता हूँ।

26क्‍योंकि मकिदुनिया और अखया के लोगों को यह अच्‍छा लगा, कि यरूशलेम के पवित्र लोगों के कंगालों के लिये कुछ चन्‍दा करें।

27अच्‍छा तो लगा, परन्‍तु वे उन के कर्जदार भी हैं, क्‍योंकि यदि अन्‍यजाति उनकी आत्‍मिक बातों में भागी हुए, तो उन्‍हें भी उचित है, कि शारीरिक बातों में उनकी सेवा करें।

28सो मैं यह काम पूरा करके और उन को यह चन्‍दा सौंपकर तुम्‍हारे पास होता हुआ इसपानिया को जाऊँगा।

29और मैं जानता हूँ, कि जब मैं तुम्‍हारे पास आऊँगा, तो मसीह की पूरी आशीष के साथ आऊँगा ।

30और हे भाइयों; मैं यीशु मसीह का जो हमारा प्रभु है और पवित्र आत्‍मा के प्रेम का स्‍मरण दिला कर, तुम से बिनती करता हूँ, कि मेरे लिये परमेश्‍वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो।

31कि मैं यहूदिया के अविश्‍वासियों से बचा रहूँ, और मेरी वह सेवा जो यरूशलेम के लिये है, पवित्र लोगों को भाए।

32और मैं परमेश्‍वर की इच्‍छा से तुम्‍हारे पास आनन्‍द के साथ आकर तुम्‍हारे साथ विश्राम पाऊँ।

33शान्‍ति का परमेश्‍वर तुम सब के साथ रहे। आमीन।।

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