Romans 142017

1जो विश्‍वास में निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो, परन्‍तु उसकी शंकाओं पर विवाद करने के लिये नहीं।

2क्‍योंकि एक को विश्‍वास है, कि सब कुछ खाना उचित है, परन्‍तु जो विश्‍वास में निर्बल है, वह साग पात ही खाता है।

3और खानेवाला न-खानेवाले को तुच्‍छ न जाने, और न-खानेवाला खानेवाले पर दोष न लगाए; क्‍योंकि परमेश्‍वर ने उसे ग्रहण किया है।

4तू कौन है जो दूसरे के सेवक पर दोष लगाता है? उसका स्‍थिर रहना या गिर जाना उसके स्‍वामी ही से सम्‍बन्‍ध रखता है, वरन् वह स्‍थिर ही कर दिया जाएगा; क्‍योंकि प्रभु उसे स्‍थिर रख सकता है।

5कोई तो एक दिन को दूसरे से बढ़कर जानता है, और कोई सब दिन एक सा जानता है: हर एक अपने ही मन में निश्‍चय कर ले।

6जो किसी दिन को मानता है, वह प्रभु के लिये मानता है: जो खाता है, वह प्रभु के लिये खाता है, क्‍योंकि परमेश्‍वर का धन्‍यवाद करता है, और जो नहीं खाता, वह प्रभु के लिये नहीं खाता और परमेश्‍वर का धन्‍यवाद करता है।

7क्‍योंकि हम में से न तो कोई अपने लिये जीता है, और न कोई अपने लिये मरता है।

8क्‍योंकि यदि हम जीवित हैं, तो प्रभु के लिये जीवित हैं; और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिये मरते हैं; सो हम जीएँ या मरें, हम प्रभु ही के हैं।

9क्‍योंकि मसीह इसी लिये मरा और जी भी उठा कि वह मरे हुओं और जीवतों, दोनों का प्रभु हो।

10तू अपने भाई पर क्‍यों दोष लगाता है? या तू फिर क्‍यों अपने भाई को तुच्‍छ जानता है? हम सब के सब परमेश्‍वर के न्‍याय सिंहासन के साम्‍हने खड़े होंगे।

11क्‍योंकि लिखा है, “प्रभु कहता है, मेरे जीवन की सौगन्‍ध कि हर एक घुटना मेरे साम्‍हने टिकेगा, और हर एक जीभ परमेश्‍वर को अंगीकार करेगी।”

12सो हम में से हर एक परमेश्‍वर को अपना अपना लेखा देगा।

13सो आगे को हम एक दूसरे पर दोष न लगाएँ पर तुम यही ठान लो कि कोई अपने भाई के सामने ठेस या ठोकर खाने का कारण न रखे।

14मैं जानता हूँ, और प्रभु यीशु से मुझे निश्‍चय हुआ है, कि कोई वस्‍तु अपने आप से अशुद्ध नहीं, परन्‍तु जो उस को अशुद्ध समझता है, उसके लिये अशुद्ध है।

15यदि तेरा भाई तेरे भोजन के कारण उदास होता है, तो फिर तू प्रेम की रीति से नहीं चलता; जिस के लिये मसीह मरा उस को तू अपने भोजन के द्वारा नाश न कर।

16अब तुम्‍हारी भलाई की निन्‍दा न होने पाए।

17क्‍योंकि परमेश्वर का राज्य खानापीना नहीं; परन्‍तु धर्म और मिलाप और वह आनन्‍द है जो पवित्र आत्‍मा स होता है।

18जो कोई इस रीति से मसीह की सेवा करता है, वह परमेश्‍वर को भाता है और म्‍यों में ग्रहणयोग्‍य ठहरता है।

19इसलिये हम उन बातों का प्रयत्‍न करें जिनसे मेल मिलाप और एक दूसरे का सुधार हो।

20भोजन के लिये परमेश्‍वर का काम न बिगाड़: सब कुछ शुद्ध तो है, परन्‍तु उस मनुष्‍य के लिये बुरा है, जिस को उसके भोजन करने से ठोकर लगती है।

21भला तो यह है, कि तू न मांस खाए, और न दाख रस पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिस से तेरा भाई ठोकर खाए।

22तेरा जो विश्‍वास हो, उसे परमेश्‍वर के सामने अपने ही मन में रख: धन्‍य है वह, जो उस बात में, जिसे वह ठीक समझता है, अपने आप को दोषी नहीं ठहराता।

23परन्‍तु जो सन्‍देह कर के खाता है, वह दण्‍ड के योग्‍य ठहर चुका, क्‍योंकि वह निश्‍चय धारणा से नहीं खाता, और जो कुछ विश्‍वास से नहीं, वह पाप है।

Copyright © 2017 Bridge Connectivity Solutions. Released under the Creative Commons Attribution No Derivatives license 4.0.

Choose Translation

Switch translation for Romans 14.

Reading Settings

Paragraph viewDisplay verses as flowing paragraphs instead of individual lines
Show verse numbersDisplay verse numbers inline
Red letterHighlight the words of Christ in red

Sign in to save your reading preferences across sessions.