Matthew 232017

1तब यीशु ने भीड़ से और अपने चेलों से कहा,

2”शास्‍त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं;

3इसलिये वे तुम से जो कुछ कहें वह करना, और मानना, परन्‍तु उनके से काम मत करना; क्‍योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं।

4”वे एक ऐसे भारी बोझ को जिन को उठाना कठिन है, बान्‍धकर उन्‍हें मनुष्‍यों के कन्‍धों पर रखते हैं; परन्‍तु आप उन्‍हें अपनी उंगली से भी सरकाना नहीं चाहते ।

5”वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं: वे अपने तावीजों को चौड़े करते, और अपने वस्‍त्रों की कोरें बढ़ाते हैं।

6”भोज में मुख्‍य-मुख्‍य जगहें, और सभा में मुख्‍य-मुख्‍य आसन,

7और बाजारों में नमस्‍कार और मनुष्‍य में रब्‍बी कहलाना उन्‍हें भाता है।

8”परन्‍तु तुम रब्‍बी न कहलाना, क्योंकि तुम्‍हारा एक ही गुरू है: और तुम सब भाई हो।

9”और पृथ्‍वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्‍योंकि तुम्‍हारा एक ही पिता है, जो स्‍वर्ग में है।

10”और स्‍वामी भी न कहलाना, क्योंकि तुम्‍हारा एक ही स्‍वामी है, अर्थात् मसीह।

11”जो तुम में बड़ा हो, वह तुम्‍हारा सेवक बने।

12”जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा: और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।

13”हे कपटी शास्‍त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम मनुष्‍यों के विरोध में स्‍वर्ग के राज्‍य का द्वार बन्‍द करते हो, न तो आप ही उसमें प्रवेश करते हो और न उसमें प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो।

14[“हे कपटी शास्‍त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्‍हें अधिक दण्‍ड मिलेगा।]

15”हे कपटी शास्‍त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

16”हे अन्‍धे अगुवों, तुम पर हाय, जो कहते हो कि यदि कोई मन्‍दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्‍तु यदि कोई मन्‍दिर के सोने की सौगन्‍ध खाए तो उससे बन्‍ध जाएगा।

17”हे मूर्खो, और अन्‍धों, कौन बड़ा है, सोना या वह मन्‍दिर जिस से सोना पवित्र होता है?

18”फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्‍तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बन्‍ध जाएगा।

19”हे अन्‍धों, कौन बड़ा है, भेंट या वेदी: जिस से भेंट पवित्र होता है?

20”इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी, और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है।

21”और जो मन्‍दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवालों की भी शपथ खाता है।

22”और जो स्‍वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्‍वर के सिहांसन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।

23”हे कपटी शास्‍त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवाँ अंश देते हो, परन्‍तु तुम ने व्‍यवस्‍था की गम्‍भीर बातों अर्थात न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्‍हें भी करते रहते, और उन्‍हें भी न छोड़ते।

24”हे अन्‍धे अगुवों, तुम मच्‍छर को तो छान डालते हो, परन्‍तु ऊँट को निगल जाते हो।

25”हे कपटी शास्‍त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो माँजते हो परन्‍तु वे भीतर अन्‍धेर असंयम से भरे हुए हैं।

26”हे अन्‍धे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से माँज कि वे बाहर से भी स्‍वच्‍छ हों।

27”हे कपटी शास्‍त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रो के समान हो जो ऊपर से तो सुन्‍दर दिखाई देती हैं, परन्‍तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं।

28”इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्‍यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्‍तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।

29”हे कपटी शास्‍त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम भविष्‍यद्वक्‍ताओं की कब्रें सँवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो।

30और कहते हो, कि यदि हम अपने बापदादों के दिनों में होते तो भविष्‍यद्वक्‍ताओं की हत्‍या में उनके साझी न होते।

31”इस से तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो, कि तुम भविष्‍यद्वक्‍ताओं के घातकों की सन्‍तान हो।

32”अतः तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा भर दो।

33”हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्‍ड से कैसे बचोगे?

34”इसलिये देखो, मैं तुम्‍हारे पास भविष्‍यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्‍त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उन में से कुछ को मार डालोगे, और क्रूस पर चढ़ाओगे; और कुछ को अपनी आराधनालयों में कोड़े मारोगे, और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे।

35जिस से धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्‍याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्‍दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लोहू पृथ्‍वी पर बहाया गया है, वह सब तुम्‍हारे सिर पर पड़ेगा। “

36”मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी।

37”हे यरूशलेम, हे यरूशलेम! तू जो भविष्‍यद्वक्‍ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्‍हें पत्‍थरवाह करता है, कितनी ही बार मैंने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्‍चों को अपने पँखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठे कर लूँ, परन्‍तु तुम ने न चाहा।

38”देखो, तुम्‍हारा घर तुम्‍हारे लिये उजाड़ छोड़ा जाता है।

39”क्‍योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि अब से जब तक तुम न कहोगे, कि धन्‍य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है, तब तक तुम मुझे फिर कभी न देखोगे।”

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