Matthew 222017

1इस पर यीशु फिर उनसे दृष्‍टान्‍तों में कहने लगा।

2”स्‍वर्ग का राज्‍य उस राजा के समान है, जिसने अपने पुत्र का ब्‍याह किया।

3”और उसने अपने दासों को भेजा, कि निमंत्रित लोगों को ब्‍याह के भोज में बुलाएँ; परन्‍तु उन्होंने आना न चाहा।

4”फिर उसने और दासों को यह कहकर भेजा, कि निमंत्रित लोगों से कहो: देखो, मैं भोज तैयार कर चुका हूँ, और मेरे बैल और पले हुए पशु मारे गए हैं: और सब कुछ तैयार है; ब्‍याह के भोज में आओ।

5”परन्‍तु वे उपेक्षा करके चल दिए: कोई अपने खेत को, कोई अपने व्यापार को।

6अन्य लोगों ने जो बच रहे थे उसके दासों को पकड़कर उन का अनादर किया और मार डाला।

7”तब राजा को क्रोध आया, और अपनी सेना भेजकर उन हत्‍यारों को नाश किया, और उनके नगर फूँक दिया।

8”तब उसने अपने दासों से कहा, ‘ब्याह का भोज तो तैयार है, परन्‍तु निमंत्रित लोग योग्‍य न ठहरे।

9इसलिये चौराहों में जाओ, और जितने लोग तुम्‍हें मिलें, सब को ब्‍याह के भोज में बुला लाओ।’

10”अतः उन दासों ने सड़कों पर जाकर क्‍या बुरे, क्‍या भले, जितने मिले, सब को इकट्ठे किया; और ब्‍याह का घर अतिथियों से भर गया।

11”जब राजा अतिथियों के देखने को भीतर आया; तो उसने वहाँ एक मनुष्‍य को देखा, जो ब्‍याह का वस्‍त्र नहीं पहने था।

12उसने उससे पूछा, ‘हे मित्र; तू ब्‍याह का वस्‍त्र पहने बिना यहाँ क्‍यों आ गया?’ उसका मुँह बन्‍द हो गया।

13”तब राजा ने सेवकों से कहा, ‘इस के हाथ-पाँव बान्‍धकर उसे बाहर अन्‍धियारे में डाल दो, वहाँ रोना, और दाँत पीसना होगा।’

14”क्‍योंकि बुलाए हुए तो बहुत परन्‍तु चुने हुए थोड़े हैं।”

15तब फरीसियों ने जाकर आपस में विचार किया, कि उसको किस प्रकार बातों में फँसाएँ।

16अतः उन्होंने अपने चेलों को हेरोदियों के साथ उसके पास यह कहने को भेजा, “हे गुरू, हम जानते हैं, कि तू सच्‍चा है, और परमेश्‍वर का मार्ग सच्‍चाई से सिखाता है, और किसी की परवाह नहीं करता, क्‍योंकि तू मनुष्‍यों का मुँह देखकर बातें नही करता।

17इस लिये हमें बता तू क्‍या समझता है? कैसर को कर देना उचित है, कि नहीं।”

18यीशु ने उनकी दुष्‍टता जानकर कहा, “हे कपटियों, मुझे क्‍यों परखते हो?

19”कर का सिक्‍का मुझे दिखाओ।” तब वे उसके पास एक दीनार ले आए।

20उसने, उनसे पूछा, “यह आकृति और नाम किस का है?”

21उन्होंने उससे कहा, “कैसर का।” तब उसने उनसे कहा, “जो कैसर का है, वह कैसर को; और जो परमेश्‍वर का है, वह परमेश्‍वर को दो।”

22यह सुनकर उन्होंने अचम्‍भा किया, और उसे छोड़कर चले गए।

23उसी दिन सदूकी जो कहते हैं कि मरे हुओं का पुनरूत्‍थान है ही नहीं उसके पास आए, और उससे पूछा,

24“हे गुरू, मूसा ने कहा था, कि यदि कोई बिना सन्‍तान मर जाए, तो उसका भाई उसकी पत्‍नी को ब्‍याह करके अपने भाई के लिये वंश उत्‍पन्न करे।

25अब हमारे यहाँ सात भाई थे; पहला ब्‍याह करके मर गया; और सन्‍तान न होने के कारण अपनी पत्‍नी को अपने भाई के लिये छोड़ गया।

26इसी प्रकार दूसरे और तीसरे ने भी किया, और सातों तक यही हुआ।

27सब के बाद वह स्‍त्री भी मर गई।

28अतः जी उठने पर वह उन सातों में से किसकी पत्‍नी होगी? क्‍योंकि वह सब की पत्‍नी हो चुकी थी।”

29यीशु ने उन्‍हें उत्तर दिया, “तुम पवित्र शास्‍त्र और परमेश्‍वर की सामर्थ्य नहीं जानते; इस कारण भूल में पड़ गए हो।

30”क्‍योंकि जी उठने पर ब्‍याह शादी न होगी; परन्‍तु वे स्‍वर्ग में परमेश्‍वर के दूतों के समान होंगे।

31”परन्‍तु मरे हुओं के जी उठने के विषय में क्‍या तुम ने यह वचन नहीं पढ़ा जो परमेश्‍वर ने तुम से कहा:

32”मैं अब्राहम का परमेश्‍वर, और इसहाक का परमेश्‍वर, और याकूब का परमेश्‍वर हूँ?’ वह तो मरे हुओं का नहीं, परन्‍तु जीवतों का परमेश्‍वर है।”

33यह सुनकर लोग उसके उपदेश से चकित हुए।

34जब फरीसियों ने सुना कि यीशु ने सदूकियों का मुँह बन्‍द कर दिया; तो वे इकट्ठे हुए।

35और उन में से एक व्‍यवस्‍थापक ने परखने के लिये, उससे पूछा,

36”हे गुरू, व्‍यवस्‍था में कौन सी आज्ञा बड़ी है?”

37उसने उससे कहा, “तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख।”

38”बड़ी और मुख्‍य आज्ञा तो यही है।

39”और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

40”ये ही दो आज्ञाएँ सारी व्‍यवस्‍था और भविष्‍यद्वक्‍ताओं का आधार है।”

41जब फरीसी इकट्ठे थे, तो यीशु ने उनसे पूछा,

42”मसीह के विषय में तुम क्‍या समझते हो? वह किस की सन्‍तान है?” उन्होंने उससे कहा, “दाऊद का।”

43उसने उनसे पूछा, “तो दाऊद आत्‍मा में होकर उसे प्रभु क्‍यों कहता है?

44”प्रभु ने, मेरे प्रभु से कहा, मेरे दाहिने बैठ, जब तक कि मैं तेरे बैरियों को तेरे पाँवों के नीचे न कर दूँ।”

45”भला, जब दाऊद उसे प्रभु कहता है, तो वह उसका पुत्र कैसे ठहरा?”

46उसके उत्तर में कोई भी एक बात न कह सका। परन्‍तु उस दिन से किसी को फिर उससे कुछ पूछने का हियाव न हुआ।

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