Matthew 122017

1उस समय यीशु सब्‍त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी, और वे बालें तोड़ तोड़कर खाने लगे।

2फरीसियों ने यह देखकर उससे कहा, “देख, तेरे चेले वह काम कर रहे हैं, जो सब्‍त के दिन करना उचित नहीं।”

3उसने उनसे कहा, “क्‍या तुम ने नहीं पढ़ा, कि दाऊद ने, जब वह और उसके साथी भूखे हुए तो क्‍या किया?

4वह कैसे परमेश्‍वर के घर में गया, और भेंट की रोटियाँ खाईं, जिन्‍हें खाना न तो उसे और न उसके साथियों को, पर केवल याजकों को उचित था?

5या क्या तुम ने व्‍यवस्‍था में नहीं पढ़ा, कि याजक सब्‍त के दिन मन्‍दिर में सब्‍त के दिन के विधि को तोड़ने पर भी निर्दोष ठहरते हैं?

6”पर मैं तुम से कहता हूँ, कि यहाँ वह है, जो मन्‍दिर से भी बड़ा है।

7”यदि तुम इस का अर्थ जानते कि मैं दया से प्रसन्न हूँ, बलिदान से नहीं, तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते।

8”मनुष्‍य का पुत्र तो सब्‍त के दिन का भी प्रभु है।”

9वहाँ से चलकर वह उनके आराधनालय में आया।

10और देखो, एक मनुष्‍य था, जिसका हाथ सूखा हुआ था; और उन्होंने उस पर दोष लगाने के लिेए उससे पूछा, कि क्‍या सब्‍त के दिन चंगा करना उचित है?

11उसने उनसे कहा, “तुम में ऐसा कौन है, जिसकी एक भेड़ हो, और वह सब्‍त के दिन गड़हे में गिर जाए, तो वह उसे पकड़कर न निकाले?

12भला, मनुष्‍य का मूल्‍य भेड़ से कितना बढ़ कर है! इसलिये सब्‍त के दिन भलाई करना उचित है।”

13तब उसने उस मनुष्‍य से कहा, “अपना हाथ बढ़ा।” उसने बढ़ाया, और वह फिर दूसरे हाथ के समान अच्‍छा हो गया।

14तब फरीसियों ने बाहर जाकर उसके विरोध में सम्‍मति की, कि उसे किस प्रकार नाश करें?

15यह जानकर यीशु वहाँ से चला गया। और बहुत लोग उसके पीछे हो लिये, और उसने सब को चंगा किया।

16और उन्‍हें चिताया, कि मुझे प्रगट न करना।

17कि जो वचन यशायाह भविष्‍यद्वक्‍ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हो:

18”देखो, यह मेरा सेवक है, जिसे मैं ने चुना है; मेरा प्रिय, जिस से मेरा मन प्रसन्न है: मैं अपना आत्‍मा उस पर डालूँगा; और वह अन्‍यजातियों को न्‍याय का समाचार देगा।

19वह न झगड़ा करेगा, और न धूम मचाएगा; और न बाजारों में कोई उसका शब्‍द सुनेगा।

20वह कुचले हुए सरकण्‍डे को न तोड़ेगा; और धूआँ देती हुई बत्ती को न बुझाएगा, जब तक न्‍याय को प्रबल न कराए।

21और अन्‍यजातियाँ उसके नाम पर आशा रखेंगी।”

22तब लोग एक अन्‍धे-गूँगे को जिसमें दुष्‍टात्‍मा थी, उसके पास लाए; और उसने उसे अच्‍छा किया; और वह गूँगा बोलने और देखने लगा।

23इस पर सब लोग चकित होकर कहने लगे, “यह क्‍या दाऊद की सन्‍तान का है?”

24परन्‍तु फरीसियों ने यह सुनकर कहा, “यह तो दुष्‍टात्‍माओं के सरदार शैतान की सहायता के बिना दुष्‍टात्‍माओं को नहीं निकालता।”

25उसने उनके मन की बात जानकर उनसे कहा, “जिस किसी राज्‍य में फूट होती है, वह उजड़ जाता है, और कोई नगर या घराना जिसमें फूट होती है, बना न रहेगा।

26”और यदि शैतान ही शैतान को निकाले, तो वह अपना ही विरोधी हो गया है; फिर उसका राज्‍य कैसे बना रहेगा?

27”भला, यदि मैं शैतान की सहायता से दुष्‍टात्‍माओं को निकालता हूँ, तो तुम्‍हारे वंश किस की सहायता से निकालते हैं? इसलिये वे ही तुम्‍हारा न्‍याय चुकाएँगे।

28”पर यदि मैं परमेश्‍वर के आत्‍मा की सहायता से दुष्‍टात्‍माओं को निकालता हूँ, तो परमेश्‍वर का राज्‍य तुम्‍हारे पास आ पहुँचा है।

29”या कैसे कोई मनुष्‍य किसी बलवन्‍त के घर में घुसकर उसका माल लूट सकता है जब तक कि पहले उस बलवन्‍त को न बान्‍ध ले? और तब वह उसका घर लूट लेगा।

30”जो मेरे साथ नहीं, वह मेरे विरोध में है; और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है।

31”इसलिये मैं तुम से कहता हूँ, कि मनुष्‍य का सब प्रकार का पाप और निन्‍दा क्षमा की जाएगी, पर पवित्र आत्‍मा की निन्‍दा क्षमा न की जाएगी।

32”जो कोई मनुष्‍य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्‍तु जो कोई पवित्र आत्‍मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

33”यदि पेड़ को अच्‍छा कहो, तो उसके फल को भी अच्‍छा कहो, या पेड़ को निकम्‍मा कहो, तो उसके फल को भी निकम्‍मा कहो; क्‍योंकि पेड़ फल ही से पहचाना जाता है।

34”हे साँप के बच्‍चों, तुम बुरे होकर कैसे अच्‍छी बातें कह सकते हो? क्‍योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है।

35”भला, मनुष्‍य मन के भले भण्‍डार से भली बातें निकालता है; और बुरा मनुष्‍य बुरे भण्‍डार से बुरी बातें निकालता है।

36”और मै तुम से कहता हूँ, कि जो-जो निकम्‍मी बातें मनुष्‍य कहेंगे, न्‍याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे।

37”क्‍योंकि तू अपनी बातों के कारण निर्दोष और अपनी बातों ही के कारण दोषी ठहराया जाएगा।”

38इस पर कितने शास्‍त्रियों और फरीसियों ने उससे कहा, “हे गुरू, हम तुझ से एक चिन्‍ह देखना चाहते हैं।”

39उसने उन्‍हें उत्तर दिया, “इस युग के बुरे और व्‍यभिचारी लोग चिन्‍ह ढूँढ़ते हैं; परन्‍तु योना भविष्‍यद्वक्‍ता के चिन्‍ह को छोड़ कोई और चिन्‍ह उनको न दिया जाएगा।

40”योना तीन रात-दिन जल जन्‍तु के पेट में रहा, वैसे ही मनुष्‍य का पुत्र तीन रात-दिन पृथ्‍वी के भीतर रहेगा।

41”नीनवे के लोग न्‍याय के दिन इस युग के लोगों के साथ उठकर उन्‍हें दोषी ठहराएँगे, क्‍योंकि उन्होंने योना का प्रचार सुनकर, मन फिराया और देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है।

42”दक्षिण की रानी न्‍याय के दिन इस युग के लोगों के साथ उठकर उन्‍हें दोषी ठहराएँगी, क्‍योंकि वह सुलैमान का ज्ञान सुनने के लिये पृथ्‍वी की छोर से आई, और देखो, यहाँ वह है जो सुलैमान से भी बड़ा है।

43”जब अशुद्ध आत्‍मा मनुष्‍य में से निकल जाती है, तो सूखी जगहों में विश्राम ढूँढ़ती फिरती है, और पाती नहीं।

44”तब कहती है, कि मैं अपने उसी घर में जहाँ से निकली थी, लौट जाऊँगी, और आकर उसे सूना, झाड़ा-बुहारा और सजा-सजाया पाती है।

45”तब वह जाकर अपने से और बुरी सात आत्‍माओं को अपने साथ ले आती है, और वे उसमें पैठकर वहाँ वास करती है, और उस मनुष्‍य की पिछली दशा पहले से भी बुरी हो जाती है। इस युग के बुरे लोगों की दशा भी ऐसी ही होगी।”

46जब वह भीड़ से बातें कर ही रहा था, तो देखो, उसकी माता और भाई बाहर खड़े थे, और उससे बातें करना चाहते थे।

47किसी ने उससे कहा, “देख तेरी माता और तेरे भाई बाहर खड़े हैं, और तुझ से बातें करना चाहते हैं।”

48यह सुन उसने कहनेवाले को उत्तर दिया, “कौन है मेरी माता? और कौन है मेरे भाई?”

49और अपने चेलों की ओर अपना हाथ बढ़ा कर कहा, देखो, “मेरी माता और मेरे भाई ये हैं।

50क्‍योंकि जो कोई मेरे स्‍वर्गीय पिता की इच्‍छा पर चले, वही मेरा भाई, और बहन, और माता है।”

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