Matthew 132017

1उसी दिन यीशु घर से निकलकर झील के किनारे जा बैठा।

2और उसके पास ऐसी बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई कि वह नाव पर चढ़ गया, और सारी भीड़ किनारे पर खड़ी रही।

3और उसने उनसे दृष्‍टान्‍तों में बहुत सी बातें कही: “देखो, एक बोनेवाला बीज बोने निकला।

4”बोते समय कुछ बीज मार्ग के किनारे गिरे और पक्षियों ने आकर उन्‍हें चुग लिया।

5”कुछ बीज पत्‍थरीली भूमि पर गिरे, जहाँ उन्‍हें बहुत मिट्टी न मिली और गहरी मिट्टी न मिलने के कारण वे जल्‍द उग आए।

6”पर सूरज निकलने पर वे जल गए, और जड़ न पकड़ने से सूख गए।

7”कुछ बीज झाड़ियों में गिरे, और झाड़ियों ने बढ़कर उन्‍हें दबा डाला।

8”पर कुछ अच्‍छी भूमि पर गिरे, और फल लाए, कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।

9”जिसके कान हों वह सुन ले।”

10और चेलों ने पास आकर उससे कहा, “तू उनसे दृष्‍टान्‍तों में क्‍यों बातें करता है?”

11उसने उत्तर दिया, “तुम को स्‍वर्ग के राज्‍य के भेदों की समझ दी गई है, पर उनको नहीं।

12”क्‍योंकि जिसके पास है, उसे दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा; पर जिसके पास कुछ नहीं है, उससे जो कुछ उसके पास है, वह भी ले लिया जाएगा।

13”मैं उनसे दृष्‍टान्‍तों में इसलिये बातें करता हूँ, कि वे देखते हुए नहीं देखते; और सुनते हुए नहीं सुनते; और नहीं समझते।

14”और उनके विषय में यशायाह की यह भविष्‍यद्ववाणी पूरी होती है: “तुम कानों से तो सुनोगे, पर समझोगे नहीं; और आंखों से तो देखोगे, पर तुम्‍हें न सूझेगा।

15”क्‍योंकि इन लोगों का मन मोटा हो गया है, और वे कानों से ऊँचा सुनते हैं और उन्होंने अपनी आँखें मूंद लीं हैं; कहीं ऐसा न हो कि वे आँखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएँ, और मैं उन्‍हें चंगा करूँ।”

16”पर धन्‍य है तुम्‍हारी आँखें, कि वे देखती हैं; और तुम्‍हारे कान, कि वे सुनते हैं।

17”क्‍योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, कि बहुत से भविष्‍यद्वक्‍ताओं ने और धर्मियों ने चाहा कि जो बातें तुम देखते हो, देखें पर न देखीं; और जो बातें तुम सुनते हो, सुनें, पर न सुनीं।

18”अब तुम बोनेवाले का दृष्‍टान्‍त सुनो:

19”जो कोई राज्‍य का वचन सुनकर नहीं समझता, उसके मन में जो कुछ बोया गया था, उसे वह दुष्‍ट आकर छीन ले जाता है; यह वही है, जो मार्ग के किनारे बोया गया था।

20”और जो पत्‍थरीली भूमि पर बोया गया, यह वह है, जो वचन सुनकर तुरन्‍त आनन्‍द के साथ मान लेता है।

21पर अपने में जड़ न रखने के कारण वह थोड़े ही दिन का है, और जब वचन के कारण क्‍लेश या उपद्रव होता है, तो तुरन्‍त ठोकर खाता है।

22”जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्‍ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता।

23”जो अच्‍छी भूमि में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनकर समझता है, और फल लाता है कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।”

24उसने उन्‍हें एक और दृष्‍टान्‍त दिया, “स्‍वर्ग का राज्‍य उस मनुष्‍य के समान है जिसने अपने खेत में अच्‍छा बीज बोया।

25”पर जब लोग सो रहे थे तो उसका बैरी आकर गेहूँ के बीच जंगली बीज बोकर चला गया।

26”जब अंकुर निकले और बालें लगी, तो जंगली दाने के पौधे भी दिखाई दिए।

27”इस पर गृहस्‍थ के दासों ने आकर उससे कहा, ‘हे स्‍वामी, क्‍या तू ने अपने खेत में अच्‍छा बीज न बोया था? फिर जंगली दाने के पौधे उसमें कहाँ से आए?’

28”उसने उनसे कहा, ‘यह किसी बैरी का काम है।’ दासों ने उससे कहा, ‘क्‍या तेरी इच्‍छा है, कि हम जाकर उनको बटोर लें?’

29”उसने कहा, ‘नहीं, ऐसा न हो कि जंगली दाने के पौधे बटोरते हुए उनके साथ गेहूँ भी उखाड़ लो।

30‘कटनी तक दोनों को एक साथ बढ़ने दो, और कटनी के समय मैं काटनेवालों से कहूँगा; पहले जंगली दाने के पौधे बटोरकर जलाने के लिये उनके गट्ठे बान्‍ध लो, और गेहूँ को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो’।”

31उसने उन्‍हें एक और दृष्‍टान्‍त दिया, “स्‍वर्ग का राज्‍य राई के एक दाने के समान है, जिसे किसी मनुष्‍य ने लेकर अपने खेत में बो दिया।

32वह सब बीजों से छोटा तो है पर जब बढ़ जाता है तब सब साग-पात से बड़ा होता है; और ऐसा पेड़ हो जाता है, कि आकाश के पक्षी आकर उसकी डालियों पर बसेरा करते हैं।”

33उसने एक और दृष्‍टान्‍त उन्‍हें सुनाया, “स्‍वर्ग का राज्‍य खमीर के समान है जिस को किसी स्‍त्री ने लेकर तीन पसेरी आटे में मिला दिया और होते-होते वह सब खमीर हो गया।”

34ये सब बातें यीशु ने दृष्‍टान्‍तों में लोगों से कहीं, और बिना दृष्‍टान्‍त वह उनसे कुछ न कहता था।

35कि जो वचन भविष्‍यद्वक्‍ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हो: “मैं दृष्‍टान्‍त कहने को अपना मुँह खोलूँगा: मैं उन बातों को जो जगत की उत्‍पत्ति से गुप्‍त रही हैं प्रगट करूँगा।”

36तब वह भीड़ को छोड़कर घर में आया, और उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा, “खेत के जंगली दाने का दृष्‍टान्‍त हमें समझा दे।”

37उसने उनको उत्तर दिया, “अच्‍छे बीज का बोनेवाला मनुष्‍य का पुत्र है।

38खेत संसार है, अच्‍छा बीज राज्‍य के सन्‍तान, और जंगली बीज दुष्‍ट के सन्‍तान हैं।

39जिस बैरी ने उनको बोया वह शैतान है; कटनी जगत का अन्‍त है: और काटनेवाले स्‍वर्गदूत हैं।

40”अतः जैसे जंगली दाने बटोरे जाते और जलाए जाते हैं वैसा ही जगत के अन्‍त में होगा।

41”मनुष्‍य का पुत्र अपने स्‍वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्‍य में से सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करनेवालों को इकट्ठा करेंगे।

42और उन्‍हें आग के कुंड में डालेंगे, वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा।

43”उस समय धर्मी अपने पिता के राज्‍य में सूर्य के समान चमकेंगे। जिसके कान हों वह सुन ले।

44”स्‍वर्ग का राज्‍य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्‍य ने पाकर छिपा दिया, और आनन्‍द के मारे जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया।

45”फिर स्‍वर्ग का राज्‍य एक व्यापारी के समान है जो अच्‍छे मोतियों की खोज में था।

46जब उसे एक बहुमूल्‍य मोती मिला तो उसने जाकर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया।

47”फिर स्‍वर्ग का राज्‍य उस बड़े जाल के समान है, जो समुद्र में डाला गया, और हर प्रकार की मछलियों को समेट लाया।

48और जब जाल भर गया, तो उसको किनारे पर खींच लाए, और बैठकर अच्‍छी-अच्‍छी तो बरतनों में इकट्ठा किया और निकम्‍मी, निकम्‍मीं फेंक दी।

49”जगत के अन्‍त में ऐसा ही होगा; स्‍वर्गदूत आकर दुष्‍टों को धर्मियों से अलग करेंगे,

50और उन्‍हें आग के कुंड में डालेंगे। वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा।

51”क्‍या तुम ने ये सब बातें समझीं?” उन्होंने उससे कहा, “हाँ।”

52उसने उनसे कहा, “इसलिये हर एक शास्‍त्री जो स्‍वर्ग के राज्‍य का चेला बना है, उस गृहस्‍थ के समान है जो अपने भण्‍डार से नई और पुरानी वस्तुएँ निकालता है।”

53जब यीशु ने सब दृष्‍टान्‍त कह चुका, तो वहाँ से चला गया।

54और अपने देश में आकर उनकी आराधनालय में उन्‍हें ऐसा उपदेश देने लगा; कि वे चकित होकर कहने लगे; कि इस को यह ज्ञान और सामर्थ्य के काम कहाँ से मिले?

55क्‍या यह बढ़ई का बेटा नहीं? और क्‍या इस की माता का नाम मरियम और इस के भाइयों के नाम याकूब और यूसुफ और शमौन और यहूदा नहीं?

56और क्‍या इस की सब बहनें हमारे बीच में नहीं रहती? फिर इस को यह सब कहाँ से मिला?

57इस प्रकार उन्होंने उसके कारण ठोकर खाई, पर यीशु ने उनसे कहा, “भविष्‍यद्वक्‍ता अपने देश और अपने घर को छोड़ और कहीं निरादर नहीं होता।”

58और उसने वहाँ उनके अविश्‍वास के कारण बहुत सामर्थ्य के काम नहीं किए।

Copyright © 2017 Bridge Connectivity Solutions. Released under the Creative Commons Attribution No Derivatives license 4.0.

Choose Translation

Switch translation for Matthew 13.

Reading Settings

Paragraph viewDisplay verses as flowing paragraphs instead of individual lines
Show verse numbersDisplay verse numbers inline
Red letterHighlight the words of Christ in red

Sign in to save your reading preferences across sessions.