John 152017

1“सच्‍ची दाखलता मैं हूँ; और मेरा पिता किसान है।

2जो डाली मुझ में है, और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है, और जो फलती है, उसे वह छाँटता है ताकि और फले।

3तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो।

4तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।

5मैं दाखलता हूँ: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्‍योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली की नाई फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्‍हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं।

7यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो माँगो और वह तुम्‍हारे लिये हो जाएगा।

8मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

9जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसे ही मैं ने तुम से प्रेम रखा मेरे प्रेम में बने रहो।

10यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे: जैसा कि मैं ने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उसके प्रेम में बना रहता हूँ।

11मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि मेरा आनन्‍द तुम में बना रहे, और तुम्‍हारा आनन्‍द पूरा हो जाए।

12“मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।

13इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे।

14जो कुछ मैं तुम्‍हें आज्ञा देता हूँ, यदि उसे करो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15अब से मैं तुम्‍हें दास न कहूँगा, क्‍योंकि दास नहीं जानता, कि उसका स्‍वामी क्‍या करता है: परन्‍तु मैं ने तुम्‍हें मित्र कहा है, क्‍योंकि मैं ने जो बातें अपने पिता से सुनीं, वे सब तुम्‍हें बता दीं।

16तुम ने मुझे नहीं चुना परन्‍तु मैं ने तुम्‍हें चुना है और तुम्‍हें ठहराया ताकि तुम जाकर फल लाओ; और तुम्‍हारा फल बना रहे, कि तुम मेरे नाम से जो कुछ पिता से माँगो, वह तुम्‍हें दे।

17इन बातें की आज्ञा मैं तुम्‍हें इसलिये देता हूँ, कि तुम एक दूसरे से प्रेम रखो। संसार से सताव

18“यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो तुम जानते हो, कि उसने तुम से पहले मुझ से भी बैर रखा।

19यदि तुम संसार के होते, तो संसार अपनों से प्रीति रखता, परन्‍तु इस कारण कि तुम संसार में के नही वरन मैंने तुम्‍हें से चुन लिया है इसी लिये संसार तुम से बैर रखता है।

20जो बात मैं ने तुम से कही थी, ‘दास अपने स्‍वामी से बड़ा नहीं होता,’ उसको याद रखो: यदि उन्होंने मुझे सताया, तो तुम्‍हें भी सताएँगे; यदि उन्होंने मेरी बात मानी, तो तुम्‍हारी भी मानेंगे।

21परन्‍तु यह सब कुछ वे मेरे नाम के कारण तुम्‍हारे साथ करेंगे क्‍योंकि वे मेरे भेजनेवाले को नहीं जानते।

22यदि मैं न आता और उनसे बातें न करता, तो वे पापी न ठहरते परन्‍तु अब उन्‍हें उनके पाप के लिये कोई बहाना नहीं।

23जो मुझ से बैर रखता है, वह मेरे पिता से भी बैर रखता है।

24यदि मैं उन में वे काम न करता, जो और किसी ने नहीं किए तो वे पापी नहीं ठहरते, परन्‍तु अब तो उन्होंने मुझे और मेरे पिता दोनों को देखा, और दोनों से बैर किया।

25और यह इसलिये हुआ, कि वह वचन पूरा हो, जो उनकी व्‍यवस्‍था में लिखा है, ‘उन्होंने मुझ से व्‍यर्थ बैर किया।’

26परन्‍तु जब वह सहायक आएगा, जिसे मैं तुम्‍हारे पास पिता की ओर से भेजूंगा, अर्थात् सत्‍य का आत्‍मा जो पिता की ओर से निकलता है, तो वह मेरी गवाही देगा।

27और तुम भी गवाह हो क्‍योंकि तुम आरम्‍भ से मेरे साथ रहे हो।

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