John 142017

1“तुम्‍हारा मन व्‍याकुल न हो, तुम परमेश्‍वर पर विश्‍वास रखते हो मुझ पर भी विश्‍वास रखो।

2मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्‍थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्‍योंकि मैं तुम्‍हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ।

3और यदि मैं जाकर तुम्‍हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्‍हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।

4और जहाँ मैं जाता हूँ तुम वहाँ का मार्ग जानते हो।”

5थोमा ने उससे कहा, “हे प्रभु, हम नहीं जानते कि तू कहाँ जाता है; तो मार्ग कैसे जानें?”

6यीशु ने उससे कहा, “मार्ग और सच्‍चाई और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।

7यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते, और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है।”

8फिलिप्‍पुस ने उससे कहा, “हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे: यही हमारे लिये बहुत है।”

9यीशु ने उससे कहा, “हे फिलिप्‍पुस, मैं इतने दिन से तुम्‍हारे साथ हूँ, और क्‍या तू मुझे नहीं जानता? जिस ने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है: तू क्‍यों कहता है कि पिता को हमें दिखा?

10क्‍या तू प्रतीति नहीं करता, कि मैं पिता में हूँ, और पिता मुझ में हैं? ये बातें जो मैं तुम से कहता हूँ, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्‍तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।

11मेरी ही प्रतीति करो, कि मैं पिता में हूँ; और पिता मुझ में है; नहीं तो कामों ही के कारण मेरी प्रतीति करो।

12“मैं तुम से सच सच कहता हूँ, कि जो मुझ पर विश्‍वास रखता है, ये काम जो मैं करता हूँ वह भी करेगा, वरन् इनसे भी बड़े काम करेगा, क्‍योंकि मैं पिता के पास जाता हूँ।

13और जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा कि पुत्र के द्वारा पिता की महिमा हो।

14यदि तुम मुझ से मेरे नाम से कुछ माँगोगे, तो मैं उसे करूँगा।

15“यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।

16और मैं पिता से विनती करूँगा, और वह तुम्‍हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्‍हारे साथ रहे।

17अर्थात् सत्‍य का आत्‍मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्‍योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है: तुम उसे जानते हो, क्‍योंकि वह तुम्‍हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।

18“मैं तुम्‍हें अनाथ न छोडूँगा, मैं तुम्‍हारे पास आता हूँ।

19और थोड़ी देर रह गई है कि संसार मुझे न देखेगा, परन्‍तु तुम मुझे देखोगे, इसलिये कि मैं जीवित हूँ, तुम भी जीवित रहोगे।

20उस दिन तुम जानोगे, कि मैं अपने पिता में हूँ, और तुम मुझ में, और मैं तुम में।

21जिसके पास मेरी आज्ञा है, और वह उन्‍हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है, उससे मेरा पिता प्रेम रखेगा, और मैं उससे प्रेम रखूंगा, और अपने आप को उस पर प्रगट करूँगा।”

22उस यहूदा ने जो इस्‍करियोती न था, उससे कहा, “हे प्रभु, क्‍या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट किया चाहता है, और संसार पर नहीं?”

23यीशु ने उसको उत्तर दिया, “यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उससे प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएँगे, और उसके साथ वास करेंगे।

24जो मुझ से प्रेम नहीं रखता, वह मेरे वचन नहीं मानता, और जो वचन तुम सुनते हो, वह मेरा नहीं वरन पिता का है, जिस ने मुझे भेजा।

25“ये बातें मैं ने तुम्‍हारे साथ रहते हुए तुम से कही।

26परन्‍तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्‍मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्‍हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्‍हें स्‍मरण कराएगा।

27मैं तुम्‍हें शान्‍ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्‍ति तुम्‍हें देता हूँ; जैसे संसार देता है, मैं तुम्‍हें नहीं देता: तुम्‍हारा मन न घबराए और न डरे।

28तुम ने सुना, कि मैं ने तुम से कहा, ‘मैं जाता हूँ, और तुम्‍हारे पास फिर आता हूँ’ यदि तुम मुझ से प्रेम रखते, तो इस बात से आनन्‍दित होते, कि मैं पिता के पास जाता हूँ क्‍योंकि पिता मुझ से बड़ा है।

29और मैं ने अब इस के होने से पहले तुम से कह दिया है, कि जब वह हो जाए, तो तुम प्रतीति करो।

30मैं अब से तुम्‍हारे साथ और बहुत बातें न करूँगा, क्‍योंकि इस संसार का सरदार आता है, और मुझ में उसका कुछ नहीं।

31परन्‍तु यह इसलिये होता है कि संसार जाने कि मैं पिता से प्रेम रखता हूँ, और जिस तरह पिता ने मुझे आज्ञा दी, मैं वैसे ही करता हूँ। उठो, यहाँ से चलें।

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