Acts 242017

1पाँच दिन के बाद हनन्‍याह महायाजक कई पुरनियों और तिरतुल्‍लुस नामक किसी वकील को साथ लेकर आया; उन्होंने हाकिम के सामने पौलुस पर नालिश की।

2जब वह बुलाया गया तो तिरतुल्‍लुस उन पर दोष लगाकर कहने लगा, “हे महाप्रतापी फेलिक्‍स, तेरे द्वारा हमें जो बड़ा कुशल होता है; और तेरे प्रबन्‍ध से इस जाति के लिये कितनी बुराइयाँ सुधरती जाती हैं।

3इसको हम हर जगह और हर प्रकार से धन्‍यवाद के साथ मानते हैं।

4परन्‍तु इसलिये कि तुझे और दु:ख नहीं देना चाहता, मैं तुझ से विनती करता हूँ, कि कृपा करके हमारी दो एक बातें सुन ले।

5क्‍योंकि हम ने इस मनुष्‍य को उपद्रवी और जगत के सारे यहूदियों में बलवा करानेवाला, और नासरियों के कुपंथ का मुखिया पाया है।

6उसने मन्‍दिर को अशुद्ध करना चाहा, और तब हमने उसे बन्दी बना लिया। [हमने उसे अपनी व्यवस्था के अनुसार दण्ड दिया होता;

7परन्तु पलटन के सरदार लूसियास ने आकर उसे बलपूर्वक हमारे हाथों से छीन लिया,

8और इस पर दोष लगाने वालों को तेरे सम्मुख आने की आज्ञा दी।] इन सब बातों को जिन के विषय में हम उस पर दोष लगाते हैं, तू आपही उसको जाँच करके जान लेगा।”

9यहूदियों ने भी उसका साथ देकर कहा, ये बातें इसी प्रकार की हैं।

10जब हाकिम ने पौलुस को बोलने के लिये संकेत किया तो उसने उत्तर दिया: “मैं यह जानकर कि तू बहुत वर्षों से इस जाति का न्‍याय करता है, आनन्‍द से अपना प्रत्‍युत्तर देता हूँ।,

11तू आप जान सकता है, कि जब से मैं यरूशलेम में भजन करने को आया, मुझे बारह दिन से ऊपर नहीं हुए।

12उन्होंने मुझे न मन्‍दिर में, न आराधनालयों में, न नगर में किसी से विवाद करते या ना भीड़ लगाते पाया;

13और न तो वे उन बातों को, जिनका विषय में वे अब मुझ पर दोष लगाते हैं, तेरे सामने उन्हें सच प्रमाणित कर सकते हैं।

14परन्‍तु यह मैं तेरे सामने मान लेता हूँ, कि जिस पंथ को वे कुपंथ कहते हैं, उसी की रीति पर मैं अपने बापदादों के परमेश्‍वर की सेवा करता हूँ: और जो बातें व्‍यवस्‍था और भविष्‍यद्वक्‍ताओं की पुस्‍तकों में लिखी है, उन सब पर विश्वास करता हूँ।

15और परमेश्‍वर से आशा रखता हूँ जो वे आप भी रखते हैं, कि धर्मी और अधर्मी दोनों का जी उठना होगा।

16इस से मैं आप भी यत्न करता हूँ, कि परमेश्‍वर की ओर और मनुष्‍यों की ओर मेरा विवेक सदा निर्दोष रहे।

17बहुत वर्षों के बाद मैं अपने लोगों को दान पहुँचाने, और भेंट चढ़ाने आया था।

18उन्होंने मुझे मन्‍दिर में, शुद्ध दशा में, बिना भीड़ के साथ, और बिना दंगा करते हुए इस काम में पाया। परन्तु वहाँ एशिया के कुछ यहूदी थे - औरउनको उचित था,

19कि यदि मेरे विरोध में उनकी कोई बात हो तो यहाँ तेरे सामने आकर मुझ पर दोष लगाते है।

20या ये आप ही कहें, कि जब मैं महासभा के सामने खड़ा था, तो उन्होंने मुझ में कौन सा अपराध पाया?

21इस एक बात को छोड़ जो मैंने उनके बीच में खड़े होकर पुकारकर कहा था, ‘मरे हुओं के जी उठने के विषय में आज मेरा तुम्‍हारे सामने मुकद्दमा हो रहा है’।”

22फेलिक्‍स ने जो इस पंथ की बातें ठीक-ठीक जानता था, उन्‍हें यह कहकर टाल दिया, “जब पलटन का सरदार लूसियास आएगा, तो तुम्‍हारी बात का निर्णय करूँगा।”

23और सूबेदार को आज्ञा दी, कि पौलुस को कुछ छूट में रखकर रखवाली करना, और उसके मित्रों में से किसी को भी उसकी सेवा करने से न रोकना।

24कुछ दिनों के बाद फेलिक्‍स अपनी पत्‍नी द्रुसिल्‍ला को, जो यहूदिनी थी, साथ लेकर आया और पौलुस को बुलवाकर उस विश्‍वास के विषय में जो मसीह यीशु पर है, उससे सुना।

25जब वह धर्म और संयम और आनेवाले न्‍याय की चर्चा कर रहा था, तो फेलिक्‍स ने भयभीत होकर उत्तर दिया, “अभी तो जा; अवसर पाकर मैं तुझे फिर बुलाऊँगा।”

26उसे पौलुस से कुछ धन मिलने की भी आशा थी; इसलिये और भी बुला-बुलाकर उससे बातें किया करता था।

27परन्‍तु जब दो वर्ष बीत गए, तो पुरकियुस फेस्‍तुस, फेलिक्‍स की जगह पर आया, और फेलिक्‍स यहूदियों को खुश करने की इच्‍छा से पौलुस को बन्दी ही छोड़ गया।

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