Acts 252017

1फेस्‍तुस उस प्रान्‍त में पहुँचकर तीन दिन के बाद कैसरिया से यरूशलेम को गया।

2तब महायाजकों ने, और यहूदियों के प्रमुख लोगों ने, उसके सामने पौलुस की दोष की;

3और उससे विनती करके उसके विरोध में यह वर चाहा कि वह उसे यरूशलेम में बुलवाए, क्‍योंकि वे उसे रास्‍ते ही में मार डालने की घात लगाए हुए थे।

4फेस्‍तुस ने उत्तर दिया, “पौलुस कैसरिया में पहरे में है, और मैं आप जल्‍द वहाँ जाऊँगा।”

5फिर कहा, “तुम से जो अधिकार रखते हैं, वे साथ चलें, और यदि इस मनुष्‍य ने कुछ अनुचित काम किया है, तो उस पर दोष लगाएँ।”

6उनके बीच कोई आठ दस दिन रहकर वह कैसरिया गया: और दूसरे दिन न्‍याय-आसन पर बैठकर पौलुस को लाने की आज्ञा दी।

7जब वह आया, तो जो यहूदी यरूशलेम से आए थे, उन्होंने आस-पास खड़े होकर उस पर बहुत से गम्भीर दोष लगाए, जिनका प्रमाण वे नहीं दे सकते थे।

8परन्‍तु पौलुस ने उत्तर दिया, “मैंने न तो यहूदियों की व्‍यवस्‍था के और न मन्‍दिर को, और न कैसर के विरुद्ध कोई अपराध किया है।”

9तब फेस्‍तुस ने यहूदियों को खुश करने की इच्‍छा से पौलुस को उत्तर दिया, “क्‍या तू चाहता है कि यरूशलेम को जाए; और वहाँ मेरे सामने तेरा यह मुकद्दमा तय किया जाए?”

10पौलुस ने कहा, “मैं कैसर के न्‍याय-आसन के सामने खड़ा हूँ: मेरे मुकद्दमें का यहीं फैसला होना चाहिए। जैसा तू अच्‍छी तरह जानता है, यहूदियों का मैंने कुछ अपराध नहीं किया।

11यदि अपराधी हूँ और मार डाले जाने योग्‍य कोई काम किया है, तो मरने से नहीं मुकरता; परन्‍तु जिन बातों का ये मुझ पर दोष लगाते हैं, यदि उनमें से कोई बात सच न ठहरे, तो कोई मुझे उनके हाथ नहीं सौंप सकता। मैं कैसर की दोहाई देता हूँ।”

12तब फेस्‍तुस ने मन्‍त्रियों की सभा के साथ विचार करके उत्तर दिया, “तू ने कैसर की दोहाई दी है, तो तू कैसर के पास ही जाएगा।”

13कुछ दिन बीतने के बाद अग्रिप्‍पा राजा और बिरनीके ने कैसरिया में आकर फेस्‍तुस से भेंट की।

14उनके बहुत दिन वहाँ रहने के बाद फेस्‍तुस ने पौलुस के विषय में राजा को बताया, “एक मनुष्‍य है, जिसे फेलिक्‍स बन्दी छोड़ गया है।

15जब मैं यरूशलेम में था, तो महायाजक और यहूदियों के पुरनियों ने उसकी नालिश की और चाहा, कि उस पर दण्‍ड की आज्ञा दी जाए।

16परन्‍तु मैंने उनको उत्तर दिया, कि रोमियों की यह रीति नहीं, कि किसी मनुष्‍य को दण्‍ड के लिये सौंप दें, जब तक मुद्दाअलैह उसे अपने मुद्दइयों के अभियोग लगाने वालों के-सामने खड़े होकर दोष के उत्तर देने का अवसर न मिले।

17अतः जब वे यहाँ उपस्थित हुए, तो मैंने कुछ देर न की, परन्‍तु दूसरे ही दिन न्‍याय-आसन पर बैठकर, उस मनुष्‍य को लाने की आज्ञा दी।

18जब उसके मुद्दई खड़े हुए, तो उन्होंने ऐसी बुरी बातों का दोष नहीं लगाया, जैसा मैं समझता था।

19परन्‍तु अपने मत के, और यीशु नामक किसी मनुष्‍य के विषय में जो मर गया था, और पौलुस उसको जीवित बताता था, विवाद करते थे।

20और मैं उलझन में था, कि इन बातों का पता कैसे लगाऊँ? इसलिये मैंने उससे पूछा, ‘क्‍या तू यरूशलेम जाएगा, कि वहाँ इन बातों का फैसला हो?’

21परन्‍तु जब पौलुस ने दोहाई दी, कि मेरे मुकद्दमें का फैसला महाराजाधिराज के यहाँ हो; तो मैंने आज्ञा दी, कि जब तक उसे कैसर के पास न भेजूँ, उसकी रखवाली की जाए।”

22तब अग्रिप्‍पा ने फेस्‍तुस से कहा, “मैं भी उस मनुष्‍य की सुनना चाहता हूँ। उसने कहा, “तू कल सुन लेगा।”

23अतः दूसरे दिन, जब अग्रिप्‍पा और बिरनीके बड़ी धूमधाम से आकर पलटन के सरदारों और नगर के प्रमुख लोगों के साथ दरबार में पहुँचे। तब फेस्‍तुस ने आज्ञा दी, कि वे पौलुस को ले आएँ।

24फेस्‍तुस ने कहा, “हे महाराजा अग्रिप्‍पा, और हे सब मनुष्‍यों जो यहाँ हमारे साथ हो, तुम इस मनुष्‍य को देखते हो, जिसके विषय में सारे यहूदियों ने यरूशलेम में और यहाँ भी चिल्‍ला-चिल्‍लाकर मुझ से विनती की, कि इसका जीवित रहना उचित नहीं।

25परन्‍तु मैंने जान लिया कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया कि मार डाला जाए; और जब कि उसने आप ही महाराजाधिराज की दोहाई दी, तो मैंने उसे भेजने का निर्णय किया।

26परन्‍तु मैंने उसके विषय में कोई ठीक बात नहीं पाई कि अपने स्‍वामी के पास लिखूँ, इसलिये मैं उसे तुम्‍हारे सामने और विशेष करके हे राजा अग्रिप्‍पा तेरे सामने लाया हूँ, कि जाँचने के बाद मुझे कुछ लिखने को मिले।

27क्‍योंकि बन्दी को भेजना और जो दोष उस पर लगाए गए, उन्‍हें न बताना, मुझे व्‍यर्थ समझ पड़ता है।”

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