Acts 232017

1पौलुस ने महासभा की ओर टकटकी लगाकर देखा, और कहा, “हे भाइयों, मैंने आज तक परमेश्‍वर के लिये बिलकुल सच्‍चे विवेक से जीवन बिताया है।”

2हनन्‍याह महायाजक ने, उनको जो उसके पास खड़े थे, उसके मुँह पर थप्‍पड़ मारने की आज्ञा दी।

3तब पौलुस ने उससे कहा, “हे चूना फिरी हुई भीत, परमेश्‍वर तुझे मारेगा। तू व्‍यवस्‍था के अनुसार मेरा न्‍याय करने को बैठा है, और फिर क्‍या व्‍यवस्‍था के विरूद्ध मुझे मारने की आज्ञा देता है?”

4जो पास खड़े थे, उन्होंने कहा, “क्‍या तू परमेश्‍वर के महायाजक को बुरा-भला कहता है?”

5पौलुस ने कहा, “हे भाइयों, मैं नहीं जानता था, कि यह महायाजक है; क्‍योंकि लिखा है, ‘अपने लोगों के प्रधान को बुरा न कह’।”

6तब पौलुस ने यह जानकर, कि एक सदूकियों और दूसरा फरीसियों का हैं, सभा में पुकारकर कहा, “हे भाइयों, मैं फरीसी और फरीसियों के वंश का हूँ, मरे हुओं की आशा और पुनरूत्‍थान के विषय में मेरा मुकद्दमा हो रहा है।”

7जब उसने यह बात कही तो फरीसियों और सदूकियों में झगड़ा होने लगा; और सभा में फूट पड़ गई।

8क्‍योंकि सदूकी तो यह कहते हैं, कि न पुनरूत्‍थान है, न स्‍वर्गदूत और न आत्‍मा है; परन्‍तु फरीसी इन सबको मानते हैं।

9तब बड़ा हल्‍ला मचा और कुछ शास्‍त्री जो फरीसियों के दल के थे, उठकर यों कहकर झगड़ने लगे, “हम इस मनुष्‍य में कुछ बुराई नहीं पाते; और यदि कोई आत्‍मा या स्‍वर्गदूत उससे बोला है तो फिर क्‍या?”

10जब बहुत झगड़ा हुआ, तो पलटन के सरदार ने इस डर से कि वे पौलुस के टुकड़े-टुकड़े न कर डालें, पलटन को आज्ञा दी कि उतरकर उसको उनके बीच में से जबरदस्ती निकालो, और गढ़ में ले आओ।

11उसी रात प्रभु ने उसके पास आ खड़े होकर कहा, “हे पौलुस, ढ़ाढ़स बाँध; क्‍योंकि जैसी तूने यरूशलेम में मेरी गवाही दी, वैसी ही तुझे रोम में भी गवाही देनी होगी।”

12जब दिन हुआ, तो यहूदियों ने एका किया, और शपथ खाई कि जब तक हम पौलुस को मार न डालें, यदि हम खाएँ या पीएँ तो हम पर धिक्‍कार।

13जिन्‍होंने यह शपथ खाई थी, वे चालीस जन से अधिक थे।

14उन्होंने महायाजकों और पुरनियों के पास आकर कहा, “हमने यह ठाना है कि जब तक हम पौलुस को मार न डालें, तब तक यदि कुछ भी चखें, तो हम पर धिक्‍कार है।

15इसलिये अब महासभा समेत पलटन के सरदार को समझाओ, कि उसे तुम्‍हारे पास ले आए, मानो कि तुम उसके विषय में और भी ठीक जाँच करना चाहते हो, और हम उसके पहुँचने से पहले ही उसे मार डालने के लिये तैयार रहेंगे।”

16और पौलुस के भांजे ने सुना कि वे उसकी घात में हैं, तो गढ़ में जाकर पौलुस को सन्‍देश दिया।

17पौलुस ने सूबेदारों में से एक को अपने पास बुलाकर कहा, “इस जवान को पलटन के सरदार के पास ले जाओ, यह उससे कुछ कहना चाहता है।”

18अतः उसने उसको पलटन के सरदार के पास ले जाकर कहा, “बन्दी पौलुस ने मुझे बुलाकर विनती की, कि यह जवान पलटन के सरदार से कुछ कहना चाहता है; इसे उसके पास ले जा।”

19पलटन के सरदार ने उसका हाथ पकड़कर, और उसे अलग ले जाकर पूछा, “तु मुझ से क्‍या कहना चाहता है?”

20उसने कहा, “यहूदियों ने एका किया है, कि तुझ से विनती करें कि कल पौलुस को महासभा में लाए, मानो तू और ठीक से उसकी जाँच करना चाहता है।

21परन्‍तु उनकी मत मानना, क्‍योंकि उनमें से चालीस के ऊपर मनुष्‍य उसकी घात में हैं, जिन्‍होंने यह ठान लिया है कि जब तक हम पौलुस को मार न डालें, तब तक न खाएँगे और न पीएँगे, और अब वे तैयार हैं और तेरे वचन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

22तब पलटन के सरदार ने जवान को यह आज्ञा देकर विदा किया, “किसी से न कहना कि तूने मुझ को ये बातें बताई हैं।”

23और दो सूबेदारों को बुलाकर कहा, “दो सौ सिपाही, सत्तर सवार, और दो सौ भालैत, पहर रात बीते कैसरिया को जाने के लिये तैयार कर रखो।”

24और पौलुस की सवारी के लिये घोड़े तैयार रखो कि उसे फेलिक्‍स हाकिम के पास कुशल से पहुँचा दें।”

25उसने इस प्रकार की चिट्ठी भी लिखी:

26“महाप्रतापी फेलिक्‍स हाकिम को क्‍लौदियुस लूसियास को नमस्‍कार;

27इस मनुष्‍य को यहूदियों ने पकड़कर मार डालना चाहा, परन्‍तु जब मैंने जाना कि वो रोमी है, तो पलटन लेकर छुड़ा लाया।

28और मैं जानना चाहता था, कि वे उस पर किस कारण दोष लगाते हैं, इसलिये उसे उनकी महासभा में ले गया।

29तब मैंने जान लिया, कि वे अपनी व्‍यवस्‍था के विवादों के विषय में उस पर दोष लगाते हैं, परन्‍तु मार डाले जाने या बाँधे जाने के योग्‍य उसमें कोई दोष नहीं।

30और जब मुझे बताया गया, कि वे इस मनुष्‍य की घात में लगे हैं तो मैंने तुरन्‍त उसको तेरे पास भेज दिया; और मुद्दइयों को भी आज्ञा दी, कि तेरे सामने उस पर नालिश करें।”

31अतः जैसे सिपाहियों को आज्ञा दी गई थी वैसे ही पौलुस को लेकर रातों-रात अन्‍तिपत्रिस में लाए।

32दूसरे दिन वे सवारों को उसके साथ जाने के लिये छोड़कर आप गढ़ को लौटे।

33उन्होंने कैसरिया में पहुँचकर हाकिम को चिट्ठी दी; और पौलुस को भी उसके सामने खड़ा किया।

34उसने पढ़कर पूछा, “यह किस प्रदेश का है?”

35और जब जान लिया कि किलकिया का है; तो उससे कहा, “जब तेरे मुद्दई भी आएँगें, तो मैं तेरा मुकद्दमा करूँगा।” और उसने उसे हेरोदेस के किले में, पहरे में रखने की आज्ञा दी।

Copyright © 2017 Bridge Connectivity Solutions. Released under the Creative Commons Attribution No Derivatives license 4.0.

Choose Translation

Switch translation for Acts 23.

Reading Settings

Paragraph viewDisplay verses as flowing paragraphs instead of individual lines
Show verse numbersDisplay verse numbers inline
Red letterHighlight the words of Christ in red

Sign in to save your reading preferences across sessions.