3 John 12017

1मुझ प्राचीन की ओर से उस प्रिय गयुस के नाम, जिस से मैं सच्‍चा प्रेम रखता हूँ।

2हे प्रिय, मेरी यह प्रार्थना है; कि जैसे तू आत्‍मिक उन्‍नति कर रहा है, वैसे ही तू सब बातों मे उन्‍नति करे, और भला चगा रहे।

3क्‍योंकि जब भाइयों ने आकर, तेरे उस सत्‍य की गवाही दी, जिस पर तू सचमुच चलता है, तो मैं बहुत ही आनन्‍दित हुआ।

4मुझे इस से बढ़कर और कोई आनन्‍द नहीं, कि मैं सुनूं, कि मेरे बच्चे सत्‍य पर चलते हैं।

5हे प्रिय, जो कुछ तू उन भाइयों के साथ करता है, जो परदेशी भी हैं, उसे विश्‍वासी की नाई करता है।

6उन्‍हों ने कलीसिया के साम्‍हने तेरे प्रेम की गवाही दी थी: यदि तू उन्‍हें उस प्रकार विदा करेगा जिस प्रकार परमेश्‍वर के लोगों के लिये उचित है तो अच्‍छा करेगा।

7क्‍योंकि वे उस नाम के लिये निकले हैं, और अन्‍यजातियों से कुछ नहीं लेते।

8इसलिये ऐसों का स्‍वागत करना चाहिए, जिस से हम भी सत्‍य के पक्ष में उन के सहकर्मी हों।

9मैं ने कलीसिया को कुछ लिखा था; पर दियुत्रिफेस जो उन में बड़ा बनना चाहता है, हमें ग्रहण नहीं करता।

10सो जब मैं आऊँगा, तो उसके कामों की जो वह कर रहा है सुधि दिलाऊँगा, कि वह हमारे विषय में बुरी बुरी बातें बकता है; और इस पर भी सन्‍तोष न करके आप ही भाइयों को ग्रहण नहीं करता, और उन्‍हें जो ग्रहण करना चाहते हैं, मना करता है: और कलीसिया से निकाल देता है।

11हे प्रिय, बुराई के नहीं, पर भलाई के अनुयायी हो, जो भलाई करता है, वह परमेश्‍वर की ओर से है; पर जो बुराई करता है, उस ने परमेश्‍वर को नहीं देखा।

12देमेत्रियुस के विषय में सब ने बरन सत्‍य ने भी आप ही गवाही दी: और हम भी गवाही देते हैं, और तू जानता है, कि हमारी गवाही सच्ची है।

13मुझे तुझ को बहुत कुछ लिखना तो था; पर सियाही और कलम से लिखना नहीं चाहता।

14पर मुझे आशा है कि तुझ से शीघ्र भेंट करूँगा: तब हम आमने - सामने बातचीत करेंगे:

15तुझे शान्‍ति मिलती रहे। यहाँ के मित्र तुझे नमस्‍कार करते हैं: वहाँ के मित्रों के नाम ले लेकर नमस्‍कार कह देना।

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