1 Thessalonians 22017

1हे भाइयों, तुम आप ही जानते हो कि हमारा तुम्‍हारे पास आना व्‍यर्थ न हुआ।

2वरन् तुम आप ही जानते हो, कि पहले पहिल फिलिप्‍पी में दुख उठाने और उपद्रव सहने पर भी हमारे परमेश्‍वर ने हमें ऐसा हियाव दिया, कि हम परमेश्‍वर का सुसमाचार भारी विरोधों के होते हुए भी तुम्‍हें सुनाएँ।

3क्‍योंकि हमारा उपदेश न भ्रम से है और न अशुद्धता से, और न छल के साथ है।

4पर जैसा परमेश्‍वर ने हमें योग्‍य ठहराकर सुसमाचार सौंपा, हम वैसा ही वर्णन करते हैं; और इस में मनुष्‍यों को नहीं, परन्‍तु परमेश्‍वर को, जो हमारे मनों को जाँचता है, प्रसन्‍न करते हैं।

5क्‍योंकि तुम जानते हो, कि हम न तो कभी चापलूसी की बातें किया करते थे, और न लोभ के लिये बहाना करते थे, परमेश्‍वर गवाह है।

6और यद्यपि हम मसीह के प्रेरित होने के कारण तुम पर बोझ डाल सकते थे, तौभी हम मनुष्‍यों से आदर नहीं चाहते थे, और न तुम से, न और किसी से।

7परन्‍तु जिस तरह माता अपने बालकों का पालन-पोषण करती है, वैसे ही हम ने भी तुम्‍हारे बीच में रहकर कोमलता दिखाई है।

8और वैसे ही हम तुम्‍हारी लालसा करते हुए, न केवल परमेश्‍वर का सुसमाचार, पर अपना अपना प्राण भी तुम्‍हें देने को तैयार थे, इसलिये कि तुम हमारे प्‍यारे हो गए थे।

9क्‍योंकि, हे भाइयों, तुम हमारे परिश्रम और कष्‍ट को स्‍मरण रखते हो, कि हम ने इसलिये रात दिन काम धन्‍धा करते हुए तुम में परमेश्‍वर का सुसमाचार प्रचार किया, कि तुम में से किसी पर भार न हों।

10तुम आप ही गवाह हो: और परमेश्‍वर भी, कि तुम्‍हारे बीच में जो विश्‍वास रखते हो हम कैसी पवित्रता और धार्मिकता और निर्दोषता से रहे।

11जैसे तुम जानते हो, कि जैसा पिता अपने बालकों के साथ बर्ताव करता है, वैसे ही हम तुम में से हर एक को भी उपदेश करते, और शान्‍ति देते, और समझाते थे।

12कि तुम्‍हारा चाल चलन परमेश्‍वर के योग्‍य हो, जो तुम्‍हें अपने राज्‍य और महिमा में बुलाता है।

13इसलिये हम भी परमेश्‍वर का धन्‍यवाद निरन्‍तर करते हैं; कि जब हमारे द्वारा परमेश्‍वर के सुसमाचार का वचन तुम्‍हारे पास पहुँचा, तो तुम ने उसे मनुष्‍यों का नहीं, परन्‍तु परमेश्‍वर का वचन समझकर (और सचमुच यह ऐसा ही है) ग्रहण किया: और वह तुम में जो विश्‍वास रखते हो, प्रभावशाली है।

14इसलिये कि तुम, हे भाइयो, परमेश्‍वर की उन कलीसियाओं की सी चाल चलने लगे, जो यहूदिया में मसीह यीशु में हैं, क्‍योंकि तुम ने भी अपने लोगों से वैसा ही दुख पाया, जैसा उन्होंने यहूदियों से पाया था।

15जिन्‍हों ने प्रभु यीशु को और भविष्यद्वक्ताओं को भी मार डाला और हम को सताया, और परमेश्‍वर उनसे प्रसन्‍न नहीं; और वे सब मनुष्‍यों को विरोध करते हैं।

16और वे अन्‍यजातियों से उनके उद्धार के लिये बातें करने से हमें रोकते हैं, कि सदा अपने पापों का नपुआ भरते रहें; पर उन पर भयानक प्रकोप आ पहुँचा है।

17हे भाइयों, जब हम थोड़ी देर के लिये मन में नहीं वरन् प्रगट में तुम से अलग हो गए थे, तो हम ने बड़ी लालसा के साथ तुम्‍हारा मुँह देखने के लिये और भी अधिक यत्‍न किया।

18इसलिये हम ने (अर्थात् मुझ पौलुस ने) एक बार नहीं, वरन् दो बार तुम्‍हारे पास आना चाहा, परन्‍तु शैतान हमें रोके रहा।

19भला हमारी आशा, या आनन्‍द या बड़ाई का मुकुट क्‍या है? क्‍या हमारे प्रभु यीशु के सम्‍मुख उसके आने के समय तुम ही न होगे?

20हमारी बड़ाई और आनन्‍द तुम ही हो।

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