1 Corinthians 102017

1हे भाइयों, मैं नहीं चाहता, कि तुम इस बात से अज्ञात रहो, कि हमारे सब बापदादे बादल के नीचे थे, और सब के सब समुद्र के बीच से पार हो गए।

2और सब ने बादल में, और समुद्र में, मूसा का बपतिस्‍मा लिया।

3और सब ने एक ही आत्‍मिक भोजन किया।

4और सब ने एक ही आत्‍मिक जल पीया, क्‍योंकि वे उस आत्‍मिक चट्टान से पीते थे, जो उनके साथ-साथ चलती थी; और वह चट्टान मसीह था।

5परन्‍तु परमेश्‍वर उन में के बहुतेरों से प्रसन्‍न न हुआ, इसलिये वे जंगल में ढेर हो गए।

6ये बातें हमारे लिये दृष्‍टान्‍त ठहरी, कि जैसे उन्होंने लालच किया, वैसे हम बुरी वस्‍तुओं का लालच न करें।

7और न तुम मूरत पूजनेवाले बनों; जैसे कि उन में से कितने बन गए थे, जैसा लिखा है, “लोग खाने-पीने बैठे, और खेलने-कूदने उठे।”

8और न हम व्‍यभिचार करें; जैसा उन में से कितनों ने किया: और एक दिन में तेईस हजार मर गये।

9और न हम प्रभु को परखें; जैसा उन में से कितनों ने किया, और साँपों के द्वारा नाश किए गए।

10और न तुम कुड़कुड़ाओ, जिस रीति से उन में से कितने कुड़कुड़ाए, और नाश करनेवाले के द्वारा नाश किए गए।

11परन्‍तु ये सब बातें, जो उन पर पड़ी, दृष्‍टान्‍त की रीति पर थीं; और वे हमारी चितावनी के लिये जो जगत के अन्‍तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं।

12इसलिये जो समझता है, “ मैं स्‍थिर हूँ,” वह चौकस रहे; कि कहीं गिर न पड़ें।

13तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्‍य के सहने के बाहर है: और परमेश्‍वर सच्‍चा है: वह तुम्‍हें सामर्थ से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको।

14इस कारण, हे मेरे प्‍यारों मूर्त्ति पूजा से बचे रहो।

15मैं बुद्धिमान जानकर, तुम से कहता हूँ: जो मैं कहता हूँ, उसे तुम परखो।

16वह धन्‍यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्‍यवाद करते हैं, क्‍या वह मसीह के लोहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़े हैं, क्‍या मसीह की देह की सहभागिता नहीं?

17इसलिये, कि एक ही रोटी है तो हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं: क्‍योंकि हम सब उसी एक रोटी में भागी होते हैं।

18जो शरीर के भाव से इस्राएली हैं, उनको देखो: क्‍या बलिदानों के खानेवाले वेदी के सहभागी नहीं?

19फिर मैं क्‍या कहता हूँ? क्‍या यह कि मूर्ति का बलिदान कुछ है, या मूरत कुछ है?

20नहीं, बस यह, कि अन्‍यजाति जो बलिदान करते हैं, वे परमेश्‍वर के लिये नहीं, परन्‍तु दुष्‍टात्‍माओं के लिये बलिदान करते हैं: और मैं नहीं चाहता, कि तुम दुष्‍टात्‍माओं के सहभागी हो।

21तुम प्रभु के कटोरे, और दुष्‍टात्‍माओं के कटोरे दोनों में से नहीं पी सकते! तुम प्रभु की मेज और दुष्‍टात्‍माओं की मेज दोनों के साझी नहीं हो सकते।

22क्‍या हम प्रभु को क्रोध दिलाते हैं? क्‍या हम उससे शक्तिमान हैं?

23सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित तो हैं, परन्‍तु सब लाभ की नहीं: सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित तो हैं, परन्‍तु सब वस्‍तुओं से उन्नति नहीं।

24कोई अपनी ही भलाई को न, ढूँढे वरन् औरों की।

25जो कुछ कस्‍साइयों के यहाँ बिकता है, वह खाओ और विवेक के कारण कुछ न पूछो।

26“क्‍योकि पृथ्‍वी और उसकी भरपूरी प्रभु की है।”

27और यदि अविश्वासियों में से कोई तुम्‍हें नेवता दे, और तुम जाना चाहो, तो जो कुछ तुम्‍हारे साम्‍हने रखा जाए वही खाओ: और विवेक के कारण कुछ न पूछो।

28परन्‍तु यदि कोई तुम से कहे, “यह तो मूरत को बलि की हुई वस्‍तु है,” तो उसी बतानेवाले के कारण, और विवेक के कारण न खाओ।

29मेरा मतलब, तेरा विवेक नहीं, परन्‍तु उस दूसरे का। भला, मेरी स्‍वतंत्रता दूसरे के विचार से क्‍यों परखी जाए?

30यदि मैं धन्‍यवाद करके साझी होता हूँ, तो जिस पर मैं धन्‍यवाद करता हूँ, उसके कारण मेरी बदनामीं क्‍यों होती है?

31सो तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्‍वर की महिमा के लिये करो।

32तुम न यहूदियों, न यूनानियों, और न परमेश्‍वर की कलीसिया के लिये ठोकर के कारण बनो।

33जैसा मैं भी सब बातों में सब को प्रसन्‍न रखता हूँ, और अपना नहीं, परन्‍तु बहुतों का लाभ ढूँढ़ता हूँ, कि वे उद्धार पाएँ।

Copyright © 2017 Bridge Connectivity Solutions. Released under the Creative Commons Attribution No Derivatives license 4.0.

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