1 Corinthians 112017

1तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ।

2हे भाइयों, मैं तुम्‍हें सराहता हूँ, कि सब बातों में तुम मुझे स्‍मरण करते हो: और जो व्‍यवहार मैं ने तुम्‍हें सौंप दिए हैं, उन्‍हें धारण करते हो।

3सो मैं चाहता हूँ, कि तुम यह जान लो, कि हर एक पुरूष का सिर मसीह है: और स्‍त्री का सिर पुरूष है: और मसीह का सिर परमेश्‍वर है।

4जो पुरूष सिर ढाँके हुए प्रार्थना या भविष्‍यद्वाणी करता है, वह अपने सिर का अपमान करता है।

5परन्‍तु जो स्‍त्री उघाड़े सिर प्रार्थना या भविष्यद्वाणी करती है, वह अपने सिर का अपमान करती है, क्‍योंकि वह मुण्‍डी होने के बराबर है।

6यदि स्‍त्री ओढ़नी न ओढ़े, तो बाल भी कटा ले; यदि स्‍त्री के लिये बाल कटाना या मुण्‍डाना लज्‍जा की बात है, तो ओढ़नी ओढ़े।

7हां पुरूष को अपना सिर ढाँकना उचित नहीं, क्‍योंकि वह परमेश्‍वर का स्‍वरूप और महिमा है; परन्‍तु स्‍त्री पुरूष की महिमा।

8क्‍योंकि पुरूष स्‍त्री से नहीं हुआ, परन्‍तु स्‍त्री पुरुष से हुई है।

9और पुरूष स्‍त्री के लिये नहीं सिरजा गया, परन्‍तु स्‍त्री पुरूष के लिये सिरजी गई है।

10इसीलिये स्‍वर्गदूतों के कारण स्‍त्री को उचित है, कि अधिकार अपने सिर पर रखे।

11तौभी प्रभु में न तो स्‍त्री बिना पुरूष और न पुरूष बिना स्‍त्री के है।

12क्‍योंकि जैसे स्‍त्री पुरूष से है, वैसे ही पुरूष स्‍त्री के द्वारा है; परन्‍तु सब वस्तुएँ परमेश्‍वर से हैं।

13तुम आप ही विचार करो, क्‍या स्‍त्री को उघाड़े सिर परमेश्‍वर से प्रार्थना करना सोहता है?

14क्‍या स्‍वाभाविक रीति से भी तुम नहीं जानते, कि यदि पुरूष लम्‍बे बाल रखे, तो उसके लिये अपमान है।

15परन्‍तु यदि स्‍त्री लम्‍बे बाल रखे; तो उसके लिये शोभा है क्‍योंकि बाल उसको ओढ़नी के लिये दिए गए हैं।

16परन्‍तु यदि कोई विवाद करना चाहे, तो यह जाने कि न हमारी और न परमेश्‍वर की कलीसिओं की ऐसी रीति है।

17परन्‍तु यह आज्ञा देते हुए, मैं तुम्‍हें नहीं सराहता, इसलिये कि तुम्‍हारे इकट्ठे होने से भलाई नहीं, परन्‍तु हानि होती है।

18क्‍योंकि पहले तो मैं यह सुनता हूँ, कि जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो, तो तुम में फूट होती है और मैं कुछ कुछ प्रतीति भी करता हूँ।

19क्‍योंकि विधर्म भी तुम में अवश्‍य होंगे, इसलिये कि जो लोग तुम में खरे निकले हैं, वे प्रगट हो जाएँ।

20सो तुम जो एक जगह में इकट्ठे होते हो तो यह प्रभु भोज खाने के लिये नहीं।

21क्‍योंकि खाने के समय एक दूसरे से पहले अपना भोज खा लेता है, सो कोई तो भूखा रहता है, और कोई मतवाला हो जाता है।

22क्‍या खाने पीने के लिये तुम्‍हारे घर नहीं? या परमेश्‍वर की कलीसिया को तुच्‍छ जानते हो, और जिन के पास नहीं है उन्‍हें लज्‍जित करते हो? मैं तुम से क्‍या कहूँ? क्‍या इस बात में तुम्‍हारी प्रशंसा करूँ? मैं प्रशंसा नहीं करता।

23क्‍योंकि यह बात मुझे प्रभु से पहुँची, और मैं ने तुम्‍हें भी पहुँचा दी; कि प्रभु यीशु ने जिस रात पकड़वाया गया रोटी ली,

24और धन्‍यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा, “यह मेरी देह है, जो तुम्‍हारे लिये है: मेरे स्‍मरण के लिये यही किया करो।”

25इसी रीति से उसने बियारी के पीछे कटोरा भी लिया, और कहा, “यह कटोरा मेरे लोहू में नई वाचा है: जब कभी पीओ, तो मेरे स्‍मरण के लिये यही किया करो।”

26क्‍योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्‍यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो।

27इसलिये जो कोई अनुचित रीति से प्रभु की रोटी खाए, या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लोहू का अपराधी ठहरेगा।

28इसलिये मनुष्‍य अपने आप को जाँच ले और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए।

29क्‍येांकि जो खाते-पीते समय प्रभु की देह को न पहिचाने, वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्‍ड लाता है।

30इसी कारण तुम में बहुत से निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए।

31यदि हम अपने आप को जाँचते, तो दण्‍ड न पाते।

32परन्‍तु प्रभु हमें दण्‍ड देकर हमारी ताड़ना करता है इसलिये कि हम संसार के साथ दोषी न ठहरें।

33इसलिये, हे मेरे भाइयों, जब तुम खाने के लिये इकट्ठे होते हो, तो एक दूसरे के लिये ठहरा करो।

34यदि कोई भूखा हो, तो अपने घर में खा ले जिस से तुम्‍हारा इकट्ठा होना दण्‍ड का कारण न हो: और शेष बातों को मैं आकर ठीक कर दूँगा।

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