Romans 62017

1सो हम क्‍या कहें? क्‍या हम पाप करते रहें कि अनुग्रह बहुत हो?

2कदापि नहीं! हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उसमें कैसे जीवन बिताएँ?

3क्‍या तुम नहीं जानते कि हम सब जितनों ने मसीह यीशु का बपतिस्‍मा लिया तो उसकी मृत्‍यु का बपतिस्‍मा लिया?

4सो उस मृत्‍यु का बपतिस्‍मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें।

5क्‍योंकि यदि हम उसकी मृत्‍यु की समानता में उसके साथ जुट गए हैं, तो निश्‍चय उसके जी उठने की समानता में भी जुट जाएँगे।

6क्‍योंकि हम जानते हैं कि हमारा पुराना मनुष्‍यत्‍व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, ताकि पाप का शरीर व्‍यर्थ हो जाए, ताकि हम आगे को पाप के दासत्‍व में न रहें।

7क्‍योंकि जो मर गया, वह पाप से छूटकर धर्मी ठहरा।

8इसलिये यदि हम मसीह के साथ मर गए, तो हमारा विश्‍वास यह है कि उसके साथ जीएँगे भी,

9क्‍योंकि यह जानते हैं, कि मसीह मरे हुओं में से जी उठकर फिर मरने का नहीं; उस पर फिर मृत्‍यु की प्रभुता नहीं होने की।

10क्‍योंकि वह जो मर गया तो पाप के लिये एक ही बार मर गया; परन्‍तु जो जीवित है, तो परमेश्‍वर के लिये जीवित है।

11ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्‍तु परमेश्‍वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो।

12इसलिये पाप तुम्‍हारे नाशवान शरीर में राज्‍य न करे, कि तुम उसकी लालसाओं के अधीन रहो।

13और न अपने अंगो को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपो, पर अपने आपको मरे हुओं में से जी उठा हुआ जानकर परमेश्‍वर को सौंपो, और अपने अंगो को धर्म के हथियार होने के लिये परमेश्‍वर को सौंपो।

14तब तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्‍योंकि तुम व्‍यवस्‍था के अधीन नहीं वरन् अनुग्रह के अधीन हो।

15तो क्‍या हुआ? क्‍या हम इसलिये पाप करें कि हम व्‍यवस्‍था के अधीन नहीं वरन् अनुग्रह के अधीन हैं? कदापि नहीं!

16क्‍या तुम नहीं जानते कि जिस की आज्ञा मानने के लिये तुम अपने आप को दासों के समान सौंप देते हो उसी के दास हो: चाहे पाप के, जिसका अन्‍त मृत्‍यु है, चाहे आज्ञा मानने के, जिसका अन्‍त धार्मिकता है?

17परन्‍तु परमेश्‍वर का धन्‍यवाद हो, कि तुम जो पाप के दास थे अब मन से उस उपदेश के माननेवाले हो गए, जिसके साँचे में ढाले गए थे,

18और पाप से छुड़ाए जाकर धर्म के दास हो गए।

19मैं तुम्‍हारी शारीरिक दुर्बलता के कारण मनुष्‍यों की रीति पर कहता हूँ। जैसे तुम ने अपने अंगो को कुकर्म के लिये अशुद्धता और कुकर्म के दास करके सौंपा था, वैसे ही अब अपने अंगों को पवित्रता के लिये धर्म के दास करके सौंप दो।

20जब तुम पाप के दास थे, तो धर्म की ओर से स्‍वतंत्र थे।

21सो जिन बातों से अब तुम लज्‍जित होते हो, उनसे उस समय तुम क्‍या फल पाते थे? क्‍योंकि उनका अन्‍त तो मृत्‍यु है।

22परन्तु अब पाप से स्‍वतंत्र होकर और परमेश्‍वर के दास बनकर तुम को फल मिला जिससे पवित्रता प्राप्‍त होती है, और उसका अन्‍त अनन्‍त जीवन है।

23क्‍योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्‍यु है, परन्‍तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्‍त जीवन है।

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