Romans 32017

1सो यहूदी की क्‍या बड़ाई, या खतने का क्‍या लाभ?

2हर प्रकार से बहुत कुछ। पहले तो यह कि परमेश्‍वर के वचन उनको सौंपे गए।

3यदि कुछ विश्वासघाती निकले भी तो क्‍या हुआ? क्‍या उनके विश्‍वासघाती होने से परमेश्‍वर की सच्‍चाई व्‍यर्थ ठहरेगी?

4कदापि नहीं! वरन् परमेश्‍वर सच्‍चा और हर एक मनुष्‍य झूठा ठहरे, जैसा लिखा है, “जिससे तू अपनी बातों में धर्मी ठहरे और न्‍याय करते समय तू जय पाए।”

5सो यदि हमारा अधर्म परमेश्‍वर की धार्मिकता ठहरा देता है, तो हम क्‍या कहें? क्‍या यह कि परमेश्‍वर जो क्रोध करता है अन्‍यायी है? (यह तो मैं मनुष्‍य की रीति पर कहता हूँ)।

6कदापि नहीं! नहीं तो परमेश्‍वर कैसे जगत का न्‍याय करेगा?

7यदि मेरे झूठ के कारण परमेश्‍वर की सच्‍चाई उसकी महिमा के लिये अधिक करके प्रगट हुई, तो फिर क्‍यों पापी के समान मैं दण्‍ड के योग्‍य ठहराया जाता हूँ?

8“हम क्‍यों बुराई न करें, कि भलाई निकले?” जैसा हम पर यही दोष लगाया भी जाता है, और कुछ कहते हैं कि इनका यही कहना है। परन्‍तु ऐसों का दोषी ठहराना ठीक है।

9तो फिर क्‍या हुआ? क्‍या हम उनसे अच्‍छे हैं? कभी नहीं; क्‍योंकि हम यहूदियों और यूनानियों दोनों पर यह दोष लगा चुके हैं कि वे सब के सब पाप के वश में हैं।

10जैसा लिखा है: “कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।

11कोई समझदार नहीं; कोई परमेश्‍वर को खोजनेवाला नहीं।

12सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्‍मे बन गए; कोई भलाई करनेवाला नहीं, एक भी नहीं।

13उन का गला खुली हुई कब्र है: उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है: उन के होठों में सापों का विष है।

14और उनका मुँह श्राप और कड़वाहट से भरा है।

15उनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं।

16उनके मार्गों में नाश और क्‍लेश है।

17उन्‍होंने कुशल का मार्ग नहीं जाना।

18उनकी आँखों के सामने परमेश्‍वर का भय नहीं।”

19हम जानते हैं, कि व्‍यवस्‍था जो कुछ कहती है उन्‍हीं से कहती है, जो व्‍यवस्‍था के अधीन हैं: इसलिये कि हर एक मुँह बन्‍द किया जाए, और सारा संसार परमेश्‍वर के दण्‍ड के योग्‍य ठहरे।

20क्‍येांकि व्‍यवस्‍था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिये कि व्‍यवस्‍था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।

21पर अब बिना व्‍यवस्‍था परमेश्‍वर की धार्मिकता प्रगट हुई है, जिसकी गवाही व्‍यवस्‍था और भविष्‍यद्वक्‍ता देते हैं,

22अर्थात् परमेश्‍वर की वह धार्मिकता, जो यीशु मसीह पर विश्‍वास करने से सब विश्‍वास करनेवालों के लिये है। क्‍योंकि कुछ भेद नहीं;

23इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्‍वर की महिमा से रहित है,

24परन्‍तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंत मेंत धर्मी ठहराए जाते हैं।

25उसे परमेश्‍वर ने उसके लहू के कारण एक ऐसा प्रायश्‍चित ठहराया, जो विश्‍वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहले किए गए, और जिन पर परमेश्‍वर ने अपनी सहनशीलता से ध्यान नहीं दिया; उन के विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे।

26वरन् इसी समय उसकी धार्मिकता प्रगट हो कि जिससे वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्‍वास करे, उसका भी धर्मी ठहरानेवाला हो।

27तो घमण्‍ड करना कहाँ रहा? उसकी तो जगह ही नहीं। कौन सी व्‍यवस्‍था के कारण से? क्‍या कर्मों की व्‍यवस्‍था से? नहीं, वरन् विश्‍वास की व्‍यवस्‍था के कारण।

28इसलिये हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं, कि मनुष्‍य व्‍यवस्‍था के कामों के बिना विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहरता है।

29क्‍या परमेश्‍वर केवल यहूदियों का है? क्‍या अन्‍यजातियों का नहीं? हाँ, अन्‍यजातियों का भी है।

30क्‍योंकि एक ही परमेश्‍वर है, जो खतनावालों को विश्‍वास से और खतनारहितों को भी विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहराएगा।

31तो क्‍या हम व्‍यवस्‍था को विश्‍वास के द्वारा व्‍यर्थ ठहराते हैं? कदापि नहीं! वरन् व्‍यवस्‍था को स्‍थिर करते हैं।

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