Luke 142017

1फिर वह सब्‍त के दिन फरीसियों के सरदारों में से किसी के घर में रोटी खाने गया: और वे उसकी घात में थे।

2और देखो, एक मनुष्‍य उसके सामने था, जिसे जलन्‍धर का रोग था।

3इस पर यीशु ने व्‍यवस्‍थापकों और फरीसियों से कहा, “क्‍या सब्‍त के दिन अच्‍छा करना उचित है, कि नहीं?”

4परन्‍तु वे चुपचाप रहे। तब उसने उसे हाथ लगा कर चंगा किया, और जाने दिया।

5और उनसे कहा, “तुम में से ऐसा कौन है, जिसका गदहा या बैल कुएँ में गिर जाए और वह सब्‍त के दिन उसे तुरन्‍त बाहर न निकाल ले?”

6वे इन बातों का कुछ उत्तर न दे सके।

7जब उसने देखा, कि आमन्त्रित लोग कैसे मुख्‍य-मुख्‍य जगह चुन लेते हैं तो एक दृष्‍टान्‍त देकर उनसे कहा,

8“जब कोई तुझे ब्‍याह में बुलाए, तो मुख्‍य जगह में न बैठना, कहीं ऐसा न हो, कि उसने तुझ से भी किसी बड़े को नेवता दिया हो।

9और जिस ने तुझे और उसे दोनों को नेवता दिया है, आकर तुझ से कहे, कि इसको जगह दे, और तब तुझे लज्‍जित होकर सब से नीची जगह में बैठना पड़े।

10“पर जब तू बुलाया जाए, तो सब से नीची जगह जा बैठ, कि जब वह, जिस ने तुझे नेवता दिया है आए, तो तुझ से कहे कि हे मित्र, आगे बढ़कर बैठ; तब तेरे साथ बैठनेवालों के सामने तेरी बड़ाई होगी।

11“क्‍योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।”

12तब उसने अपने नेवता देनेवाले से भी कहा, “जब तू दिन का या रात का भोज करे, तो अपने मित्रों या भाइयों या कुटुम्‍बियों या धनवान पड़ोसियों को न बुला, कहीं ऐसा न हो, कि वे भी तुझे नेवता दें, और तेरा बदला हो जाए।

13“परन्‍तु जब तू भोज करे, तो कंगालों, टुण्‍डों, लंगड़ों और अन्‍धों को बुला।

14तब तू धन्‍य होगा, क्‍योंकि उनके पास तुझे बदला देने को कुछ नहीं, परन्‍तु तुझे धर्मियों के जी उठने पर इसका प्रतिफल मिलेगा।”

15उसके साथ भोजन करनेवालों में से एक ने ये बातें सुनकर उससे कहा, “धन्‍य है वह, जो परमेश्‍वर के राज्‍य में रोटी खाएगा।”

16उसने उससे कहा, “किसी मनुष्‍य ने बड़ा भोज दिया और बहुतों को बुलाया।

17जब भोजन तैयार हो गया, तो उसने अपने दास के हाथ आमन्त्रित लोगों को कहला भेजा, कि आओ; अब भोजन तैयार है।

18“पर वे सब के सब क्षमा माँगने लगे, पहले ने उससे कहा, ‘मैंने खेत मोल लिया है, और अवश्‍य है कि उसे दखूँ; मैं तुझ से विनती करता हूँ, मुझे क्षमा करा दे।’

19“दूसरे ने कहा, ‘मैं ने पाँच जोड़े बैल मोल लिए हैं, और उन्‍हें परखने जाता हूँ; मैं तुझ से विनती करता हूँ, मुझे क्षमा करा दे।’

20“एक और ने कहा, ‘मै ने ब्‍याह किया है, इसलिये मैं नहीं आ सकता।’

21“उस दास ने आकर अपने स्‍वामी को ये बातें कह सुनाईं। तब घर के स्‍वामी ने क्रोध में आकर अपने दास से कहा, ‘नगर के बाजारों और गलियों में तुरन्‍त जाकर कंगालों, टुण्‍डों, लंगड़ों और अन्‍धों को यहाँ ले आओ।’

22“दास ने फिर कहा, ‘हे स्‍वामी, जैसे तूने कहा था, वैसे ही किया गया है; फिर भी जगह है।'

23“स्‍वामी ने दास से कहा, ‘सड़कों पर और बाड़ों की ओर जाकर लोगों को बरबस ले ही आ ताकि मेरा घर भर जाए।

24‘क्‍योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि उन आमन्त्रित लोगों में से कोई मेरे भोज को न चखेगा’।”

25और जब बड़ी भीड़ उसके साथ जा रही थी, तो उसने पीछे फिरकर उनसे कहा।

26“यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्‍नी और बच्चों और भाइयों और बहनों वरन अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता;

27“और जो कोई अपना क्रूस न उठाए; और मेरे पीछे न आए; वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता।

28“तुम में से कौन है कि गढ़ बनाना चाहता हो, और पहले बैठकर खर्च न जोड़े, कि पूरा करने की सामर्थ्य मेरे पास है कि नहीं?

29“कहीं ऐसा न हो, कि जब नींव डालकर तैयार न कर सके, तो सब देखने वाले यह कहकर उसे ठट्ठों में उड़ाने लगें,

30कि यह मनुष्‍य बनाने तो लगा, पर तैयार न कर सका?

31“या कौन ऐसा राजा है, कि दूसरे राजा से युद्ध करने जाता हो, और पहले बैठकर विचार न कर ले कि जो बीस हजार लेकर मुझ पर चढ़ा आता है, क्‍या मैं दस हजार लेकर उसका सामना कर सकता हूँ, कि नहीं?

32“नहीं तो उसके दूर रहते ही, वह दूतों को भेजकर मिलाप करना चाहेगा।

33“इसी रीति से तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्‍याग न दे, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता।

34“नमक तो अच्‍छा है, परन्‍तु यदि नमक का स्‍वाद बिगड़ जाए, तो वह किस वस्‍तु से नमकीन किया जाएगा।

35“वह न तो भूमि के और न खाद के लिये काम में आता है: उसे तो लोग बाहर फेंक देते हैं। जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले।”

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