Hebrews 112017

1अब विश्‍वास आशा की हुई वस्‍तुओं का निश्‍चय, और अन देखी वस्‍तुओं का प्रमाण है।

2क्‍योंकि इसी के विषय में प्राचीनों की अच्‍छी गवाही दी गईं।

3विश्‍वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्‍टि की रचना परमेश्‍वर के वचन के द्वारा हुई है। यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्‍तुओं से बना हो।

4विश्‍वास ही से हाबिल ने कैन से उत्तम बलिदान परमेश्‍वर के लिये चढ़ाया; और उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही भी दी गई: क्‍योंकि परमेश्‍वर ने उस की भेंटों के विषय में गवाही दी; और उसी के द्वारा वह मरने पर भी अब तक बातें करता है।

5विश्‍वास ही से हनोक उठा लिया गया, कि मृत्‍यु को न देखे, और उसका पता नहीं मिला; क्‍योंकि परमेश्‍वर ने उसे उठा लिया था, और उसके उठाए जाने से पहले उस की यह गवाही दी गई थी, कि उसने परमेश्‍वर को प्रसन्‍न किया है।

6और विश्‍वास बिना उसे प्रसन्‍न करना अनहोना है, क्‍योंकि परमेश्‍वर के पास आनेवाले को विश्‍वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।

7विश्‍वास ही से नूह ने उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, चितौनी पाकर भक्ति के साथ अपने घराने के बचाव के लिये जहाज बनाया, और उसके द्वारा उसने संसार को दोषी ठहराया; और उस धर्म का वारिस हुआ, जो विश्‍वास से होता है।

8विश्‍वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेनेवाला था, और यह न जानता था, कि मैं किधर जाता हूँ; तौभी निकल गया।

9विश्‍वास ही से उसने प्रतिज्ञा किए हुए देश में जैसे पराए देश में परदेशी रहकर इसहाक और याकूब समेत जो उसके साथ उसी प्रतिज्ञा के वारिस थे, तम्‍बूओं में वास किया।

10क्‍योंकि वह उस स्‍थिर नेववाले नगर की बाट जोहता था, जिस का रचनेवाला और बनानेवाला परमेश्‍वर है।

11विश्‍वास से सारा ने आप बूढ़ी होने पर भी गर्भ धारण करने की सामर्थ पाई; क्‍योंकि उसने प्रतिज्ञा करनेवाले को सच्‍चा जाना था।

12इस कारण एक ही जन से जो मरा हुआ सा था, आकाश के तारों और समुद्र के तीर के बालू की नाई, अनगिनित वंश उत्‍पन्‍न हुआ।

13ये सब विश्‍वास ही की दशा में मरे; और उन्‍हों ने प्रतिज्ञा की हुई वस्‍तुएँ नहीं पाई; पर उन्‍हें दूर से देखकर आनन्‍दित हुए और मान लिया, कि हम पृथ्‍वी पर परदेशी और बाहरी हैं।

14जो ऐसी ऐसी बातें कहते हैं, वे प्रगट करते हैं, कि स्‍वदेश की खोज में हैं।

15और जिस देश से वे निकल आए थे, यदि उस की सुधि करते तो उन्‍हें लौट जाने का अवसर था।

16पर वे एक उत्तम अर्थात् स्‍वर्गीय देश के अभिलाषी हैं, इसी लिये परमेश्‍वर उन का परमेश्‍वर कहलाने में उनसे नहीं लजाता, सो उसने उन के लिये एक नगर तैयार किया है।

17विश्‍वास ही से अब्राहम ने, परखे जाने के समय में, इसहाक को बलिदान चढ़ाया, और जिस ने प्रतिज्ञाओं को सच माना था।

18और जिस से यह कहा गया था, “इसहाक से तेरा वंश कहलाएगा,” वह अपने एकलौते को चढ़ाने लगा।

19क्‍योंकि उसने विचार किया, कि परमेश्‍वर सामर्थी है, कि मरे हुओं में से जिलाए, सो उन्‍हीं में से दृष्‍टान्‍त की रीति पर वह उसे फिर मिला।

20विश्‍वास ही से इसहाक ने याकूब और एसाव को आनेवाली बातों के विषय मे आशीष दी।

21विश्‍वास ही से याकूब ने मरते समय यूसुफ के दोनों पुत्रों में से एक एक को आशीष दी, और अपनी लाठी के सिरे पर सहारा लेकर दण्‍डवत किया।

22विश्‍वास ही से यूसुफ ने, जब वह मरने पर था, तो इस्राएल की सन्‍तान के निकल जाने की चर्चा की, और अपनी हड्डियों के विषय में आज्ञा दी।

23विश्‍वास ही से मूसा के माता पिता ने उस को, उत्‍पन्‍न होने के बाद तीन महीने तक छिपा रखा; क्‍योंकि उन्‍हों ने देखा, कि बालक सुन्‍दर है, और वे राजा की आज्ञा से न डरे।

24विश्‍वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्‍कार किया।

25इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्‍वर के लोगों के साथ दु:ख भोगना और उत्तम लगा।

26और मसीह के कारण निन्‍दित होने को मिसर के भण्‍डार से बड़ा धन समझा: क्‍योंकि उस की आँखे फल पाने की ओर लगी थीं।

27विश्‍वास ही से राजा के क्रोध से न डरकर उसने मिसर को छोड़ दिया, क्‍योंकि वह अनदेखे को मानों देखता हुआ दृढ़ रहा।

28विश्‍वास ही से उसने फसह और लहू छिड़कने की विधि मानी, कि पहिलौठों का नाश करनेवाला इस्राएलियों पर हाथ न डाले।

29विश्‍वास ही से वे लाल समुद्र के पार ऐसे उतर गए, जैसे सूखी भूमि पर से; और जब मिस्रियों ने वैसा ही करना चाहा, तो सब डूब मरे।

30विश्‍वास ही से यरीहो की शहरपनाह, जब सात दिन तक उसका चक्‍कर लगा चुके तो वह गिर पड़ी।

31विश्‍वास ही से राहाब वेश्‍या आज्ञा न माननेवालों के साथ नाश नहीं हुई; इसलिये कि उसने भेदियों को कुशल से रखा था।

32अब और क्‍या कहूँ? क्‍योंकि समय नहीं रहा, कि गिदोन का, और बाराक और शिमशोन का, और यिफतह का, और दाऊद का और शामुएल का, और भविष्‍यद्वक्‍ताओं का वर्णन करूँ।

33इन्‍हों ने विश्‍वास ही के द्वारा राज्‍य जीते; धर्म के काम किए; प्रतिज्ञा की हुई वस्‍तुएँ प्राप्‍त की, सिंहों के मुँह बन्‍द किए,

34आग की ज्‍वाला को ठंडा किया; तलवार की धार से बच निकले, निर्बलता में बलवन्‍त हुए; लड़ाई में वीर निकले; विदेशियों की फौजों को मार भगाया।

35स्‍त्रियों ने अपने मरे हुओं को फिर जीवते पाया; कितने तो मार खाते खाते मर गए; और छुटकारा न चाहा; इसलिये कि उत्तम पुनरूत्‍थान के भागी हों।

36कई एक ठट्ठों में उड़ाए जाने; और कोड़े खाने; वरन बान्‍धे जाने; और कैद में पड़ने के द्वारा परखे गए।

37पत्‍थरवाह किए गए; आरे से चीरे गए; उन की परीक्षा की गई; तलवार से मारे गए; वे कंगाली में और क्‍लेश में और दु:ख भोगते हुए भेड़ों और बकरियों की खालें ओढ़े हुए, इधर उधर मारे मारे फिरे।

38और जंगलों, और पहाड़ों, और गुफाओं में, और पृथ्‍वी की दरारों में भटकते फिरे।

39संसार उन के योग्य न था: और विश्‍वास ही के द्वारा इन सब के विषय में अच्‍छी गवाही दी गई, तौभी उन्‍हें प्रतिज्ञा की हुई वस्‍तु न मिली।

40क्‍योंकि परमेश्‍वर ने हमारे लिये पहले से एक उत्तम बात ठहराई, कि वे हमारे बिना सिद्धता को न पहुँचे।

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