Acts 52017

1हनन्‍याह नामक एक मनुष्‍य, और उसकी पत्‍नी सफीरा ने कुछ भूमि बेची।

2और उसके दाम में से कुछ रख छोड़ा; और यह बात उसकी पत्‍नी भी जानती थी, और उसका एक भाग लाकर प्रेरितों के पाँवों के आगे रख दिया।

3परन्‍तु पतरस ने कहा, “हे हनन्‍याह! शैतान ने तेरे मन में यह बात क्‍यों डाली है कि तू पवित्र आत्‍मा से झूठ बोले, और भूमि के दाम में से कुछ रख छोड़े?

4जब तक वह तेरे पास रही, क्‍या तेरी न थी? और जब बिक गई तो क्‍या तेरे वश में न थी? तू ने यह बात अपने मन में क्‍यों सोचा? तू मनुष्‍यों से नहीं, परन्‍तु परमेश्‍वर से झूठ बोला।”

5ये बातें सुनते ही हनन्‍याह गिर पड़ा, और प्राण छोड़ दिए; और सब सुननेवालों पर बड़ा भय छा गया।

6फिर जवानों ने उठकर उसकी अर्थी बनाई और बाहर ले जाकर गाड़ दिया।

7लगभग तीन घंटे के बाद उसकी पत्‍नी, जो कुछ हुआ था न जानकर, भीतर आई।

8तब पतरस ने उससे कहा, “मुझे बता क्‍या तुम ने वह भूमि इतने ही में बेची थी?” उसने कहा, “हाँ, इतने ही में।”

9पतरस ने उससे कहा, “यह क्‍या बात है, कि तुम दोनों ने प्रभु की आत्‍मा के परीक्षा के लिये एका किया है? देख, तेरे पति के गाड़नेवाले द्वार ही पर खड़े हैं, और तुझे भी बाहर ले जाएँगे।”

10तब वह तुरन्‍त उसके पाँवों पर गिर पड़ी, और प्राण छोड़ दिए; और जवानों ने भीतर आकर उसे मरा पाया, और बाहर ले जाकर उसके पति के पास गाड़ दिया।

11और सारी कलीसिया पर और इन बातों के सब सुननेवालों पर, बड़ा भय छा गया।

12प्रेरितों के हाथों से बहुत चिन्‍ह और अद्भुत काम लोगों के बीच में दिखाए जाते थे, (और वे सब एक चित्त होकर सुलैमान के ओसारे में इकट्ठे हुआ करते थे।

13परन्‍तु औरों में से किसी को यह हियाव न होता था कि, उनमें जा मिलें; फिर भी लोग उनकी बड़ाई करते थे।

14और विश्‍वास करनेवाले बहुतेरे पुरूष और स्‍त्रियाँ प्रभु की कलीसिया में और भी अधिक आकर मिलते रहे।)

15यहाँ तक कि लोग बीमारों को सड़कों पर ला-लाकर, खाटों और खटोलों पर लिटा देते थे, कि जब पतरस आए, तो उसकी छाया ही उनमें से किसी पर पड़ जाए।

16और यरूशलेम के आस-पास के नगरों से भी बहुत लोग बीमारों और अशुद्ध आत्‍माओं के सताए हुओं को ला-लाकर, इकट्ठे होते थे, और सब अच्‍छे कर दिए जाते थे।

17तब महायाजक और उसके सब साथी जो सदूकियों के पंथ के थे, डाह से भर कर उठे।

18और प्रेरितों को पकड़कर बन्‍दीगृह में बन्‍द कर दिया।

19परन्‍तु रात को प्रभु के एक स्‍वर्गदूत ने बन्‍दीगृह के द्वार खोलकर उन्‍हें बाहर लाकर कहा,

20“जाओ, मन्‍दिर में खड़े होकर, इस जीवन की सब बातें लोगों को सुनाओ।”

21वे यह सुनकर भोर होते ही मन्‍दिर में जाकर उपदेश देने लगे। परन्‍तु महायाजक और उसके साथियों ने आकर महासभा को और इस्राएलियों के सब पुरनियों को इक्कठा किया, और बन्‍दीगृह में कहला भेजा कि उन्‍हें लाएँ।

22परन्‍तु अधिकारीयों ने वहाँ पहुँचकर उन्‍हें बन्‍दीगृह में न पाया, और लौटकर संदेश दिया,

23“हम ने बन्‍दीगृह को बड़ी चौकसी से बन्‍द किया हुआ, और पहरेवालों को बाहर द्वारों पर खड़े हुए पाया; परन्तु जब खोला, तो भीतर कोई न मिला।”

24जब मन्‍दिर के सरदार और महायाजकों ने ये बातें सुनीं, तो उनके विषय में भारी चिन्‍ता में पड़ गए कि उनका क्‍या हुआ!

25इतने में किसी ने आकर उन्‍हें बताया, “देखो, जिन्‍हें तुम ने बन्‍दीगृह में बन्‍द रखा था, वे मनुष्‍य मन्‍दिर में खड़े हुए लोगों को उपदेश दे रहे हैं।”

26तब सरदार, अधिकारीयों के साथ जाकर, उन्‍हें ले आया, परन्‍तु बलपूर्वक नहीं, क्‍योंकि वे लोगों से डरते थे, कि हम पर पत्थराव न करें।

27उन्होंने उन्‍हें फिर लाकर महासभा के सामने खड़ा कर दिया और महायाजक ने उनसे पूछा,

28“क्‍या हम ने तुम्‍हें चिताकर आज्ञा न दी थी, कि तुम इस नाम से उपदेश न करना? फिर भी देखो, तुम ने सारे यरूशलेम को अपने उपदेश से भर दिया है और उस व्यक्ति का लहू हमारी गर्दन पर लाना चाहते हो।”

29तब पतरस और, अन्य प्रेरितों ने उत्तर दिया, “मनुष्‍यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्‍य है।

30हमारे बापदादों के परमेश्‍वर ने यीशु को जिलाया, जिसे तुम ने क्रूस पर लटकाकर मार डाला था।

31उसी को परमेश्‍वर ने प्रभु और उध्दारकर्ता ठहराकर, अपने दाहिने हाथ से सर्वोच्‍च किया, कि वह इस् राएलियों को मन फिराव की शक्ति और पापों की क्षमा प्रदान करे।

32और हम इन बातों के गवाह हैं, और पवित्र आत्‍मा भी, जिसे परमेश्‍वर ने उन्‍हें दिया है, जो उसकी आज्ञा मानते हैं।”

33यह सुनकर वे जल उठे, और उन्‍हें मार डालना चाहा।

34परन्‍तु गमलीएल नामक एक फरीसी ने जो व्‍यवस्‍थापक और सब लोगों में माननीय था, न्‍यायालय में खड़े होकर प्रेरितों को थोड़ी देर के लिये बाहर कर देने की आज्ञा दी।

35तब उसने कहा, “हे इस्राएलियों, जो कुछ इन मनुष्‍यों से करना चाहते हो, सोच समझ के करना।

36क्‍योंकि इन दिनों से पहले थियूदास यह कहता हुआ उठा, कि मैं भी कुछ हूँ; और कोई चार सौ मनुष्‍य उसके साथ हो लिए, परन्‍तु वह मारा गया; और जितने लोग उसे मानते थे, सब तित्तर-बित्तर हुए और मिट गए।

37उसके बाद नाम लिखाई के दिनों में यहूदा गलीली उठा, और कुछ लोग अपनी ओर कर लिए; वह भी नाश हो गया, और जितने लोग उसे मानते थे, सब तित्तर-बित्तर हो गए।

38इसलिये अब मैं तुम से कहता हूँ, इन मनुष्‍यों से दूर ही रहो और उनसे कुछ काम न रखो; क्‍योंकि यदि यह धर्म या काम मनुष्‍यों की ओर से हो तब तो मिट जाएगा;

39परन्‍तु यदि परमेश्‍वर की ओर से है, तो तुम उन्‍हें कदापि मिटा न सकोगे; कहीं ऐसा न हो, कि तुम परमेश्‍वर से भी लड़नेवाले ठहरो।”

40तब उन्होंने उसकी बात मान ली; और प्रेरितों को बुलाकर पिटवाया; और यह आज्ञा देकर छोड़ दिया, कि यीशु के नाम से फिर बातें न करना।

41वे इस बात से आनन्‍दित होकर महासभा के सामने से चले गए, कि हम उसके नाम के लिये निरादर होने के योग्‍य तो ठहरे।

42और प्रतिदिन मन्‍दिर में और घर-घर में उपदेश करने, और इस बात का सुसमाचार सुनाने से, कि यीशु ही मसीह है न रूके।

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