2 Timothy 32017

1पर यह जान रख, कि अन्‍तिम दिनों में कठिन समय आएँगे।

2क्‍योंकि मनुष्‍य अपस्‍वार्थी, लोभी, डींगमार, अभिमानी, निन्‍दक, माता-पिता की आज्ञा टालनेवाले, कृतघ्‍न, अपवित्र,

3मयारहित, क्षमारहित, दोष लगानेवाले, असंयमी, कठोर, भले के बैरी,

4विश्‍वासघाती, ढीठ, घमण्‍डी, और परमेश्‍वर के नहीं वरन् सुखविलास ही के चाहनेवाले होंगे।

5वे भक्ति का भेष तो धरेंगे, पर उसकी शक्ति को न मानेंगे; ऐसों से परे रहना।

6इन्‍हीं में से वे लोग हैं, जो घरों में दबे पाँव घुस आते हैं और उन छिछोरी स्‍त्रियों को वश में कर लेते हैं, जो पापों से दबी और हर प्रकार की अभिलाषाओं के वश में हैं।

7और सदा सीखती तो रहती हैं पर सत्‍य की पहिचान तक कभी नहीं पहुँचतीं।

8और जैसे यन्‍नेस और यम्‍ब्रेस ने मूसा का विरोध किया था वैसे ही ये भी सत्‍य का विरोध करते हैं: ये तो ऐसे मनुष्‍य हैं, जिन की बुद्धि भ्रष्‍ट हो गई है और वे विश्‍वास के विषय में निकम्‍मे हैं।

9पर वे इस से आगे नहीं बढ़ सकते, क्‍योंकि जैसे उनकी अज्ञानता सब मनुष्‍यों पर प्रगट हो गई थी, वैसे ही इन की भी हो जाएगी।

10पर तू ने उपदेश, चाल चलन, मनसा, विश्‍वास, सहनशीलता, प्रेम, धीरज, और सताए जाने, और दुख उठाने में मेरा साथ दिया।

11और ऐसे दुखों में भी जो अन्‍ताकिया और इकुनियुम और लुस्‍त्रा में मुझ पर पड़े थे और और दुखों में भी, जो मैं ने उठाए हैं; परन्‍तु प्रभु ने मुझे उन सब से छुड़ा लिया।

12पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएँगे।

13और दुष्‍ट, और बहकानेवाले धोखा देते हुए, और धोखा खाते हुए, बिगड़ते चले जाएँगे।

14पर तू इन बातों पर जो तू ने सीखीं हैं और प्रतीति की थी, यह जानकर दृढ़ बना रह; कि तू ने उन्‍हें किन लोगों से सीखा है,

15और बालकपन से पवित्र शास्‍त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्‍वास करने से उद्धार प्राप्‍त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है।

16हर एक पवित्रशास्‍त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है,

17ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्‍पर हो जाए।

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