2 Timothy 22017

1इसलिये हे मेरे पुत्र, तू उस अनुग्रह से जो मसीह यीशु में है, बलवन्‍त हो जा।

2और जो बातें तू ने बहुत गवाहों के साम्‍हने मुझ से सुनी है, उन्‍हें विश्‍वासी मनुष्‍यों को सौंप दे; जो औरों को भी सिखाने के योग्‍य हों।

3मसीह यीशु के अच्‍छे योद्धा की नाई मेरे साथ दुख उठा।

4जब कोई योद्धा लड़ाई पर जाता है, तो इसलिये कि अपने भरती करनेवाले को प्रसन्‍न करे, अपने आप को संसार के कामों में नहीं फंसाता

5फिर अखाड़े में लड़नेवाला यदि विधि के अनुसार न लड़े तो मुकुट नहीं पाता।

6जो गृहस्‍थ परिश्रम करता है, फल का अंश पहले उसे मिलना चाहिए।

7जो मैं कहता हूँ, उस पर ध्‍यान दे और प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा।

8यीशु मसीह को स्‍मरण रख, जो दाऊद के वंश से हुआ, और मरे हुओं में से जी उठा; और यह मेरे सुसमाचार के अनुसार है।

9जिसके लिये मैं कुकर्मी की नाई दुख उठाता हूँ, यहाँ तक कि कैद भी हूँ; परन्‍तु परमेश्‍वर का वचन कैद नहीं।

10इस कारण मैं चुने हुए लोगों के लिये सब कुछ सहता हूँ, कि वे भी उस उद्धार को जो मसीह यीशु में हैं अनन्‍त महिमा के साथ पाएँ।

11यह बात सच है, कि यदि हम उसके साथ मर गए हैं तो उसके साथ जीएँगे भी।

12यदि हम धीरज से सहते रहेंगे, तो उसके साथ राज्‍य भी करेंगे: यदि हम उसका इन्‍कार करेंगे तो वह भी हमारा इन्‍कार करेगा।

13यदि हम अविश्‍वासी भी हों तौभी वह विश्‍वासयोग्‍य बना रहता है, क्‍योंकि वह आप अपना इन्‍कार नहीं कर सकता।

14इन बातों की सुधि उन्‍हें दिला, और प्रभु के साम्‍हने चिता दे, कि शब्‍दों पर तर्क-वितर्क न किया करें, जिन से कुछ लाभ नहीं होता; वरन् सुननेवाले बिगड़ जाते हैं।

15अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्‍य और ऐसा काम करनेवाला ठहराने का प्रयत्‍न कर, जो लज्‍जित होने न पाए, और जो सत्‍य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो।

16पर अशुद्ध बकवाद से बचा रह; क्‍योंकि ऐसे लोग और भी अभक्ति में बढ़ते जाएँगे।

17और उन का वचन सड़े-घाव की तरह फैलता जाएगा: हुमिनयुस और फिलेतुस उन्‍हीं में से हैं,

18जो यह कहकर कि पुनरूत्‍था हो चुका है सत्‍य से भटक गए हैं, और कितनों के विश्‍वास को उलट पुलट कर देते हैं।

19तौभी परमेश्‍वर की पक्‍की नेव बनी रहती है, और उस पर यह छाप लगी है: “प्रभु अपनों को पहिचानता है,” और “जो कोई प्रभु का नाम लेता है, वह अधर्म से बचा रहे।”

20बड़े घर में न केवल सोने-चान्‍दी ही के, पर काठ और मिट्टी के बरतन भी होते हैं; कोई कोई आदर, और कोई कोई अनादर के लिये।

21यदि कोई अपने आप को इन से शुद्ध करेगा, तो वह आदर का बरतन, और पवित्र ठहरेगा; और स्‍वामी के काम आएगा, और हर भले काम के लिये तैयार होगा।

22जवानी की अभिलाषाओं से भाग; और जो शुद्ध मन से प्रभु का नाम लेते हैं, उनके साथ धर्म, और विश्‍वास, और प्रेम, और मेल-मिलाप का पीछा कर।

23पर मूर्खता, और अविद्या के विवादों से अलग रह; क्‍योंकि तू जानता है, कि उनसे झगड़े होते हैं।

24और प्रभु के दास को झगड़ालू नहीं होना चाहिए, पर सब के साथ कोमल और शिक्षा में निपुर्ण, और सहनशील हो।

25और विरोधियों को नम्रता से समझाए, क्‍या जाने परमेश्‍वर उन्‍हें मन फिराव का मन दे, कि वे भी सत्‍य को पहिचानें।

26और इस के द्वारा उसकी इच्‍छा पूरी करने के लिये सचेत होकर शैतन के फंदे से छूट जाएँ।

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