1इस पर नामात प्रदेश के सोपर ने उत्तर दिया:
2“अय्यूब, तेरे विचार विकल है, सो मैं तुझे निश्चय ही उत्तर दूँगा। मुझे निश्चय ही जल्दी करनी चाहिये तुझको बताने को कि मैं क्या सोच रहा हूँ।
3तेरे सुधान भरे उत्तर हमारा अपमान करते हैं। किन्तु मैं विवेकी हूँ और जानता हूँ कि तुझे कैसे उत्तर दिया जाना चाहिये।
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6चाहे दुष्ट व्यक्ति का अभिमान नभ छू जाये, और उसका सिर बादलों को छू जाये,
7किन्तु वह सदा के लिये नष्ट हो जायेगा जैसे स्वयं उसका देहमल नष्ट होगा। वे लोग जो उसको जानते हैं कहेंगे, “वह कहाँ है”
8वह ऐसे विलुप्त होगा जैसे स्वप्न शीघ्र ही कहीं उड़ जाता है। फिर कभी कोई उसको देख नहीं सकेगा, वह नष्ट हो जायेगा, उसे रात के स्वप्न की तरह हाँक दिया जायेगा।
9वे व्यक्ति जिन्होंने उसे देखा था फिर कभी नहीं देखेंगे। उसका परिवार फिर कभी उसको नहीं देख पायेगा।
10जो कुछ भी उसने (दुष्ट) गरीबों से लिया था उसकी संताने चुकायेंगी। उनको अपने ही हाथों से अपना धन लौटाना होगा।
11जब वह जवान था, उसकी काया मजबूत थी, किन्तु वह शीघ्र ही मिट्टी हो जायेगी।
12दुष्ट के मुख को दुष्टता बड़ी मीठी लगती है, वह उसको अपनी जीभ के नीचे छुपा लेगा।
13बुरा व्यक्ति उस बुराई को थामे हुये रहेगा, उसका दूर हो जाना उसको कभी नहीं भायेगा, सो वह उसे अपने मुँह में ही थामे रहेगा।
14किन्तु उसके पेट में उसका भोजन जहर बन जायेगा, वह उसके भीतर ऐसे बन जायेगा जैसे किसी नाग के विष सा कड़वा जहर।
15दुष्ट सम्पत्तियों को निगल जाता है किन्तु वह उन्हें बाहर ही उगलेगा। परमेश्वर दुष्ट के पेट से उनको उगलवायेगा।
16दुष्ट जन साँपों के विष को चूस लेगा किन्तु साँपों के विषैले दाँत उसे मार डालेंगे।
17फिर दुष्ट जन देखने का आनन्द नहीं लेंगे ऐसी उन नदियों का जो शहद और मलाई लिये बहा करती हैं।
18दुष्ट को उसका लाभ वापस करने को दबाया जायेगा। उसको उन वस्तुओं का आनन्द नहीं लेने दिया जायेगा जिनके लिये उसने परिश्रम किया है।
19क्योंकि उस दुष्ट जन ने दीन जन से उचित व्यवहार नहीं किया। उसने उनकी परवाह नहीं की और उसने उनकी वस्तुऐं छीन ली थी, जो घर किसी और ने बनाये थे उसने वे हथियाये थे।
20दुष्ट जन कभी भी तृप्त नहीं होता है, उसका धन उसको नहीं बचा सकता है।
21जब वह खाता है तो कुछ नहीं छोड़ता है, सो उसकी सफलता बनी नहीं रहेगी।
22जब दुष्ट जन के पास भरपूर होगा तभी दु:खों का पहाड़ उस पर टूटेगा।
23दुष्ट जन वह सब कुछ खा चुकेगा जिसे वह खाना चाहता है। परमेश्वर अपना धधकता क्रोध उस पर डालेगा। उस दुष्ट व्यक्ति पर परमेश्वर दण्ड बरसायेगा।
24सम्भव है कि वह दुष्ट लोहे की तलवार से बच निकले, किन्तु कहीं से काँसे का बाण उसको मार गिरायेगा।
25वह काँसे का बाण उसके शरीर के आर पार होगा और उसकी पीठ भेद कर निकल जायेगा। उस बाण की चमचमाती हुई नोंक उसके जिगर को भेद जायेगी और वह भय से आतंकित हो जायेगा।
26उसके सब खजाने नष्ट हो जायेंगे, एक ऐसी आग जिसे किसी ने नहीं जलाया उसको नष्ट करेगी, वह आग उनको जो उसके घर में बचे हैं नष्ट कर डालेगी।
27स्वर्ग प्रमाणित करेगा कि वह दुष्ट अपराधी है, यह गवाही धरती उसके विरुद्ध देगी।
28जो कुछ भी उसके घर में है, वह परमेश्वर के क्रोध की बाढ़ में बह जायेगा।
29यह वही है जिसे परमेश्वर दुष्टों के साथ करने की योजना रचता है। यह वही है जैसा परमेश्वर उन्हें देने की योजना रचता है।”