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3इस्राएल के सभी लोग शकेम गए। वे रहूबियाम को राजा बनाने गये। रहूबियाम भी राजा बनने के लिये शकेम गया। लोगों ने रहूबियाम से कहा,
4“तुम्हारे पिता ने हम लोगों को बहुत कठोर श्रम करने के लिये विवश किया। अब तुम इसे हम लोगों के लिये कुछ सरल करो। उस कठिन काम को बन्द करो जिसे करने के लिये तुम्हारे पिता ने हमें विवश किया था। तब हम तुम्हारी सेवा करेंगे।”
5रहूबियाम ने उत्तर दिया, “तीन दिन में मेरे पास वापस लौट कर आओ और मैं उत्तर दूँगा।” अत: लोग चले गये।
6कुछ अग्रज लोग थे जो सुलैमान के जीवित रहते उसके निर्णय करने में सहायता करते थे। इसलिए राजा रहूबियाम ने इन व्यक्तियों से पूछा कि उसे क्या करना चाहिये। उसने कहा, “आप लोग क्या सोचते हैं, मुझे इन लोगों को क्या उत्तर देना चाहिये”
7अग्रजों ने उत्तर दिया, “यदि आज तुम उनके सेवक की तरह रहोगे तो वे सच्चाई से तुम्हारी सेवा करेंगे। यदि तुम दयालुता के साथ उनसे बातें करोगे तब वे तुम्हारी सदा सेवा करेंगे।”
8किन्तु रहूबियाम ने उनकी यह सलाह न मानी। उसने उन नवयुवकों से सलाह ली जो उसके मित्र थे।
9रहूबियाम ने कहा, “लोग यह कहते हैं, ‘हमें उससे सरल काम दो जो तुम्हारे पिता ने दिया था।’ तुम क्या सोचते हो, मुझे लोगों को कैसे उत्तर देना चाहिये मैं उनसे क्या कहूँ”
10राजा के युवक मित्रों ने कहा, “वे लोग तुम्हारे पास आए और उन्होंने तुमसे कहा, ‘तुम्हारे पिता ने हमें कठिन श्रम करने के लिये विवश किया। अब हम लोगों का काम सरस करें।’ अत: तुम्हें डिंग मारनी चाहिये और उनसे कहना चाहिये, ‘मेरी छोटी उंगली मेरे पिता के पूरे शरीर से अधिक शक्तिशाली है।
11मेरे पिता ने तुम्हें कठिन श्रम करने को विवश किया। किन्तु में उससे भी बहुत कठिन काम कराऊँगा! मेरे पिता ने तुमसे काम लेने के लिये कोड़ों का उपयोग किया था। मैं तुम्हें उन कोड़ों से पीटूँगा जिनमें धारदार लोहे के टुकड़े हैं, तुम्हें घायल करने के लिये!”
12रहूबियाम ने लोगों से कहा था, “तीन दिन में मेरे पास वापस आओ।” इसलिये तीन दीन बाद इस्राएल के सभी लोग रहूबियाम के पास लौटे।
13उस समय राजा रहूबियाम ने उनसे कठोर शब्द कहे। उसने अग्रजों की सलाह न मानी।
14उसने वही किया जो उसके मित्रों ने उसे करने को कहा। रहूबियाम ने कहा, “मेरे पिता ने तुम्हें कठिन श्रम करने को विवश किया। अत: मैं तुम्हें और अधिक काम दूँगा। मेरे पिता ने तुमको कोड़े से पीटा। किन्तु मैं तुम्हें उन कोड़ों से पीटूँगा जिनमें तुम्हें घायल करने के लिये धरादर लोहे के टुकड़े हैं।”
15अत: राजा ने वह नहीं किया जिसे लोग चाहते थे। यहोवा ने ऐसा होने दिया। यहोवा ने यह अपनी उस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिये किया जो उसने नाबात के पुत्र यारोबाम के साथ की थी। यहोवा ने अहिय्याह नबी का उपयोग यह प्रतिज्ञा करने के लिये किया था। अहिय्याह शीलो का था।
16इस्राएल के सभी लोगों ने समझ लिया कि नये राजा ने उनकी बात अनसुनी कर दी है। इसलिये लोगों ने राजा से कहा, “क्या हम दाऊद के परिवार के अंग हैं नहीं! क्या हमें यिशै की भूमि में से कुछ मिला है नहीं! अत: इस्राएलियों हम अपने घर चलें। दाऊद के पुत्र को अपने लोगों पर शासन करने दो।” अत: इस्राएल के लोग अपने घर वापस गए।
17किन्तु रहूबियाम फिर भी उन इस्राएलियों पर शासन करता रहा, जो यहूदा के नगरों में रहते थे।
18अदोराम नामक एक व्यक्ति सब श्रमिकों का अधिकारी था। राजा रहूबियाम ने अदोराम को लोगों से बात चीत करने के लिये भेजा। किन्तु इस्राएल के लोगों ने उस पर तब तक पत्थर बरसाये जब तक वह मर नहीं गया। तब राजा रहूबियाम अपने रथ तक दौड़ा और यरूशलेम को भाग निकला।
19इस प्रकर इस्राएल ने दाऊद के परिवार से विद्रोह कर दिया और वे अब भी आज तक दाऊद के परिवार के विरुद्ध हैं।
20इस्राएल के सभी लोगों ने सुना कि यारोबाम वापस लौट आया है। इसलिये उन्होंने उसे एक सभा में आमन्त्रित किया और उसे पूरे इस्राएल का राजा बना दिया। केवल यहूदा का परिवार समूह ही एक मात्र परिवार समूह था जो दाऊद के परिवार का अनुसरण करता रहा।
21रहूबियाम यरुशलेम को वापस गया। उसने यहूदा के परिवार समूह और बिन्यामीन के परिवार समूह को इकट्ठा किया। यह एक लाख अस्सी हजार पुरुषों की सेना थी। रहूबियाम इस्राएल के लोगों के विरुद्ध युद्ध लड़ना चाहता था। वह अपने राज्य को वापस लेना चाहता था।
22किन्तु यहोवा ने परमेश्वर के एक व्यक्ति से बातें कीं। उसका नाम शमायहा था। परमेश्वर ने कहा,
23“यहूदा के राजा, सुलैमान के पुत्र, रहूबियाम और यहूदा तथा बिन्यामीन के सभी लोगों से बात करो।
24उनसे कहो, ‘यहोवा कहता है कि तुम्हें अपने भाइयों इस्राएल के लोगों के विरुद्ध युद्ध में नहीं जाना चाहिये। तुम सबको घर लौट जाना चाहिये। मैंने इन सभी घटनाओं को घटित होने दिया है।” अत: रहूबियाम की सेना के पुरुषों ने यहोवा का आदेश माना। वे, सभी अपने घर लौट गए।
25शकेम, एप्रैम के पहाड़ी प्रदेश में एक नगर था। यारोबाम ने शकेम को एक सुदृढ़ नगर बनाया और उसमें रहने लगा। इसके बाद वह पनूएल नगर को गया और उसे भी सुदृढ़ किया।
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28इसलिये राजा ने अपने सलाहकारों से पूछा कि उसे क्या करना चाहिये उन्होंने उसे अपनी सलाह दीं। अत: यारोबाम ने दो सुनहले बछड़े बनाये। राजा यारोबाम ने लोगों से कहा, “तुम्हें उपासना करने यरूशलेम नहीं जाना चाहिये। इस्राएलियों, ये देवता हैं जो तुम्हें मिस्र से बाहर ले आए।”
29राजा यारोबाम ने एक सुनहले बछड़े को बेतेल में रखा। उसने दूसरे सुनहले बछड़े को दान में रखा।
30किन्तु यह बहुत बड़ा पाप था। इस्राएल के लोगों ने बेतेल और दान नगरों की यात्रा बछड़ों की पूजा करने के लिये की। किन्तु यह बहुत बड़ा पाप था।
31यारोबाम ने उच्च स्थानों पर पूजागृह भी बनाए। उसने इस्राएल के विभिन्न परिवार समूहों से याजक भी चुने। (उसने केवल लेवी परिवार समूह से याजक नहीं चुने।)
32और राजा यारोबाम ने एक नया पर्व आरम्भ किया। यह पर्व यहूदा के “फसहपर्व” की तरह था। किन्तु यह पर्व आठवें महीनें के पन्द्रहवें दिन था-पहले महीने के पन्द्रहवें दिन नहीं। उस समय राजा बेतेल नगर की वेदी पर बलि भेंट करता था और वह बलि उन बछड़ों को भेंट करता था जिन्हें उसने बनवाया था। राजा यारोबाम ने बेतेल में उन उच्चस्थानों के लिये याजक भी चुने, जिन्हें उसने बनाया था।
33इसलिये राजा यारोबाम इस्राएलियों के लिये पर्व के लिये अपना ही समय चुना। यह आठवें महीने का पन्द्रहवाँ दिन था। उन दिनों वह उस वेदी पर बलि भेंट करता था और सुगन्धि जलाता था जिसे उसने बनाया था। यह बेतेल नगर में था।