1शूही वंश के बिलदद ने कहा:
2‘परमेश्वर ही प्रभुता करता, और सृष्टि में अपने प्रति भक्ति उत्पन्न करता है। वह अपने सर्वोच्च स्वर्ग में शान्ति का स्थापक है।
3क्या उसकी सेना की कोई गिनती है? किसके ऊपर उसका प्रकाश नहीं चमकता?
4तब क्या मनुष्य उसके सम्मुख धार्मिक सिद्ध हो सकता है? नारी से उत्पन्न मानव कदापि पवित्र नहीं हो सकता है!
5देखो, चन्द्रमा भी परमेश्वर की दृष्टि में प्रकाशहीन है; ये तारे भी निस्तेज हैं!
6फिर मनुष्य की क्या गिनती! वह तो कीड़ा है! मानव-सन्तान केंचुआ-मात्र है!’