Romans 112017

1इसलिये मैं कहता हूँ, क्‍या परमेश्‍वर ने अपनी प्रजा को त्‍याग दिया? कदापि नहीं! मैं भी तो इस्राएली हूँ; अब्राहम के वंश और बिन्‍यामीन के गोत्र में से हूँ।

2परमेश्‍वर ने अपनी उस प्रजा को नहीं त्‍यागा, जिसे उसने पहिले ही से जाना: क्‍या तुम नहीं जानते, कि पवित्र शास्‍त्र एलियाह की कथा में क्‍या कहता है; कि वह इस्राएल के विरोध में परमेश्‍वर से बिनती करता है।

3“हे प्रभु, उन्‍हों ने तेरे भविष्‍यद्वक्‍ताओं को घात किया, और तेरी वेदियों को ढ़ा दिया है; और मैं ही अकेला बच रहा हूँ, और वे मेरे प्राण के भी खोजी हैं।”

4परन्‍तु परमेश्‍वर से उसे क्‍या उत्तर मिला “मैं ने अपने लिये सात हजार पुरूषों को रख छोड़ा है जिन्‍हों ने बाअल के आगे घुटने नहीं टेके हैं।”

5सो इसी रीति से इस समय भी, अनुग्रह से चुने हुए कितने लोग बाकी हैं।

6यदि यह अनुग्रह से हुआ है, तो फिर कर्मों से नहीं, नहीं तो अनुग्रह फिर अनुग्रह नहीं रहा।

7सो परिणाम क्‍या हुआ? यह कि इस्राएली जिस की खोज में हैं, वह उन को नहीं मिला; परन्‍तु चुने हुओं को मिला और शेष लोग कठोर किए गए हैं।

8जैसा लिखा है, “परमेश्‍वर ने उन्‍हें आज के दिन तक भारी नींद में डाल रखा है और ऐसी आँखें दी जो न देखें और ऐसे कान जो न सुनें।”

9और दाऊद कहता है, “उन का भोजन उन के लिये जाल, और फन्‍दा, और ठोकर, और दण्‍ड का कारण हो जाए।

10उनकी आँखों पर अन्‍धेरा छा जाए ताकि न देखें, और तू सदा उनकी पीठ को झुकाए रख।”

11सो मैं कहता हूँ क्‍या उन्‍हों ने इसलिये ठोकर खाई, कि गिर पड़ें? कदापि नहीं: परन्‍तु उन के गिरने के कारण अन्‍यजातियों को उद्धार मिला, कि उन्‍हें जलन हो।

12सो यदि उन का गिरना जगत के लिये धन और उनकी घटी अन्‍यजातियों के लिये सम्‍पत्ति का कारण हुआ, तो उनकी भरपूरी से कितना न होगा।

13मैं तुम अन्‍यजातियों से यह बातें कहता हूँ: जब कि मैं अन्यजातियों के लिये प्रेरित हूँ, तो मैं अपनी सेवा की बड़ाई करता हूँ,

14ताकि किसी रीति से मैं अपने कुटुम्‍बियों से जलन करवाकर उन में से कई एक का उद्धार कराऊँ।

15क्‍योंकि जब कि उन का त्‍याग दिया जाना जगत के मिलाप का कारण हुआ, तो क्‍या उन का ग्रहण किया जाना मरे हुओं में से जी उठने के बराबर न होगा?

16जब भेंट का पहिला पेड़ा पवित्र ठहरा, तो पूरा गूँधा हुआ आटा भी पवित्र है: और जब जड़ पवित्र ठहरी, तो डालियाँ भी ऐसी ही हैं।

17और यदि कई एक डाली तोड़ दी गई, और तू जंगली जैतून होकर उनमें साटा गया, और जैतून की जड़ की चिकनाई का भागी हुआ है।

18तो डालियों पर घमण्‍ड न करना; और यदि तू घमण्‍ड करे, तो जान रख, कि तू जड़ को नहीं, परन्‍तु जड़ तुझे सम्‍भालती है।

19फिर तू कहेगा, “डालियाँ इसलिये तोड़ी गई, कि मैं साटा जाऊँ।”

20भला, वे तो अविश्‍वास के कारण तोड़ी गई, परन्‍तु तू विश्‍वास से बना रहता है इसलिये अभिमानी न हो, परन्‍तु भय कर,

21क्‍योंकि जब परमेश्‍वर ने स्‍वाभाविक डालियाँ न छोड़ी, तो तुझे भी न छोड़ेगा।

22इसलिये परमेश्‍वर की कृपा और कड़ाई को देख! जो गिर गए, उन पर कड़ाई, परन्‍तु तुझ पर कृपा, यदि तू उस में बना रहे, नहीं तो, तू भी काट डाला जाएगा।

23और वे भी यदि अविश्‍वास में न रहें, तो साटे जाएँगे क्‍योंकि परमेश्वर उन्‍हें फिर साट सकता है।

24क्‍योंकि यदि तू उस जलपाई से, जो स्‍वभाव से जंगली है काटा गया और स्‍वभाव के विरूद्ध अच्‍छी जलपाई में साटा गया तो ये जो स्‍वाभाविक डालियाँ हैं, अपने ही जलपाई में साटे क्‍यों न जाएँगे ।

25हे भाइयों, कहीं ऐसा न हो, कि तुम अपने आप को बुद्धिमान समझ लो; इसलिये मैं नहीं चाहता कि तुम इस भेद से अनजान रहो, कि जब तक अन्यजातियाँ पूरी रीति से प्रवेश न कर लें, तब तक इस्राएल का एक भाग ऐसा ही कठोर रहेगा।

26और इस रीति से सारा इस्राएल उद्धार पाएगा; जैसा लिखा है, “छुड़ानेवाला सिय्‍योन से आएगा, और अभक्ति को याकूब से दूर करेगा।

27और उन के साथ मेरी यही वाचा होगी, जब कि मैं उन के पापों को दूर कर दूँगा।”

28वे सुसमाचार के भाव से तो तुम्‍हारे वे परमेश्वर के बैरी हैं, परन्‍तु चुन लिये जाने के भाव से बापदादों के प्‍यारे हैं।

29क्‍योंकि परमेश्‍वर अपने बरदानों से, और बुलाहट से कभी पीछे नहीं हटता।

30क्‍योंकि जैसे तुम ने पहिले परमेश्‍वर की आज्ञा न मानी परन्‍तु अभी उन के आज्ञा न मानने से तुम पर दया हुई।

31वैसे ही उन्‍हों ने भी अब आज्ञा न मानी कि तुम पर जो दया होती है इस से उन पर भी दया हो।

32क्‍योंकि परमेश्‍वर ने सब को आज्ञा न मानने के कारण बन्‍द कर रखा ताकि वह सब पर दया करे।

33आहा! परमेश्‍वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्‍या ही गंभीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं!

34“प्रभु कि बुद्धि को किस ने जाना? या उसका मंत्री कौन हुआ?

35या किस ने पहिले उसे कुछ दिया है जिस का बदला उसे दिया जाए?”

36क्‍योंकि उसकी ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है: उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे: आमीन।

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