Philippians 42017

1इसलिये हे मेरे प्रिय भाइयों, जिन में मेरा जी लगा रहता है जो मेरे आनन्‍द और मुकुट हो, हे प्रिय भाइयो, प्रभु में इसी प्रकार स्‍थिर रहो।

2मैं यूओदिया को भी समझाता हूँ, और सुन्‍तुखे को भी, कि वे प्रभु में एक मन रहें।

3और हे सच्‍चे सहकर्मी मैं तुझ से भी विनती करता हूँ, कि तू उन स्‍त्रियों की सहायता कर, क्‍योंकि उन्होंने मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्‍लेमेंस और मेरे उन और सहकर्मियों समेत परिश्रम किया, जिनके नाम जीवन की पुस्‍तक में लिखे हुए हैं।

4प्रभु में सदा आनन्‍दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्‍दित रहो।

5तुम्‍हारी कोमलता सब मनुष्‍यों पर प्रगट हो। प्रभु निकट है।

6किसी भी बात की चिन्‍ता मत करो; परन्‍तु हर एक बात में तुम्‍हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्‍यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्‍मुख उपस्‍थित किए जाएँ।

7तब परमेश्‍वर की शान्‍ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्‍हारे हृदय और तुम्‍हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।

8इसलिये, हे भाइयों, जो-जो बातें सत्‍य हैं, और जो-जो बातें आदरणीय हैं, और जो-जो बातें उचित हैं, और जो-जो बातें पवित्र हैं, और जो-जो बातें सुहावनी हैं, और जो-जो बातें मनभावनी हैं, निदान, जो-जो सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्‍हीं पर ध्‍यान लगाया करो।

9जो बातें तुमने मुझ से सीखीं, और ग्रहण की, और सुनी, और मुझ में देखीं, उन्‍हीं का पालन किया करो, तब परमेश्‍वर जो शान्‍ति का सोता है तुम्‍हारे साथ रहेगा।।

10मैं प्रभु में बहुत आनन्‍दित हूँ कि अब इतने दिनों के बाद तुम्‍हारा विचार मेरे विषय में फिर जागृत हुआ है; निश्‍चय तुम्‍हें आरम्‍भ में भी इसका विचार था, पर तुम्‍हें अवसर न मिला।

11यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूँ; क्‍योंकि मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्‍तोष करुँ।

12मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ; हर एक बात और सब दशाओं में मैंने तृप्‍त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है।

13जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।

14तौभी तुमने भला किया कि मेरे क्‍लेश में मेरे सहभागी हुए।

15और हे फिलिप्‍पियो, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्‍भ में जब मैंने मकिदुनिया से कूच किया तब तुम्‍हें छोड़ और किसी मण्‍डली ने लेने-देने के विषय में मेरी सहयता नहीं की।

16इसी प्रकार जब मैं थिस्‍सलुनीके में था; तब भी तुमने मेरी घटी पूरी करने के लिये एक बार क्‍या वरन् दो बार कुछ भेजा था।

17यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ परन्‍तु मैं ऐसा फल चाहता हूँ, जो तुम्‍हारे लाभ के लिये बढ़ता जाए।

18मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्‍तुएँ तुमने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्‍हें पाकर मैं तृप्‍त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्‍ध और ग्रहण करने के योग्‍य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।

19और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्‍हारी हर एक घटी को पूरी करेगा।

20हमारे परमेश्‍वर और पिता की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

21हर एक पवित्र जन को जो यीशु मसीह में हैं नमस्‍कार कहो। जो भाई मेरे साथ हैं तुम्‍हें नमस्‍कार कहते हैं।

22सब पवित्र लोग, विशेष करके जो कैसर के घराने के हैं तुम को नमस्‍कार कहते हैं।

23हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम्‍हारी आत्‍मा के साथ रहे।

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