Philippians 12017

1मसीह यीशु के दास पौलुस और तीमुथियुस की ओर से सब पवित्र लोगों के नाम, जो मसीह यीशु में होकर फिलिप्‍पी में रहते हैं, अध्‍यक्षों और सेवकों समेत,

2हमारे पिता परमेश्‍वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्‍हें अनुग्रह और शान्‍ति मिलती रहे। धन्यवाद और कलीसिया के लिये प्रार्थना

3मैं जब-जब तुम्‍हें स्‍मरण करता हूँ, तब-तब अपने परमेश्‍वर का धन्‍यवाद करता हूँ,

4और जब कभी तुम सब के लिये विनती करता हूँ, तो सदा आनन्‍द के साथ विनती करता हूँ

5इसलिये कि तुम पहले दिन से लेकर आज तक सुसमाचार के फैलाने में मेरे सहभागी रहे हो।

6मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्‍छा काम आरम्‍भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।

7उचित है कि मैं तुम सब के लिये ऐसा ही विचार करूँ, क्‍योंकि तुम मेरे मन में आ बसे हो, और मेरी कैद में और सुसमाचार के लिये उत्तर और प्रमाण देने में तुम सब मेरे साथ अनुग्रह में सहभागी हो।

8इसमें परमेश्‍वर मेरा गवाह है कि मैं मसीह यीशु की सी प्रीति करके तुम सब की लालसा करता हूँ।

9और मैं यह प्रार्थना करता हूँ, कि तुम्‍हारा प्रेम, ज्ञान और सब प्रकार के विवेक सहित और भी बढ़ता जाए,

10यहाँ तक कि तुम उत्तम से उत्तम बातों को प्रिय जानो, और मसीह के दिन तक सच्‍चे बने रहो, और ठोकर न खाओ;

11और उस धार्मिकता के फल से जो यीशु मसीह के द्वारा होते हैं, भरपूर होते जाओ जिससे परमेश्‍वर की महिमा और स्‍तुति होती रहे।

12हे भाइयों, मैं चाहता हूँ, कि तुम यह जान लो कि मुझ पर जो बीता है, उससे सुसमाचार ही की बढ़ती हुई है।

13यहाँ तक कि कैसर राज्‍य की सारी पलटन और शेष सब लोगों में यह प्रगट हो गया है कि मैं मसीह के लिये कैद हूँ,

14और प्रभु में जो भाई हैं, उनमें से अधिकांश मेरे कैद होने के कारण, हियाव बाँध कर, परमेश्‍वर का वचन निधड़क सुनाने का और भी हियाव करते हैं।

15कुछ तो डाह और झगड़े के कारण मसीह का प्रचार करते हैं और कुछ भली मनसा से।

16कई एक तो यह जान कर कि मैं सुसमाचार के लिये उत्तर देने को ठहराया गया हूँ प्रेम से प्रचार करते हैं।

17और कई एक तो सीधाई से नहीं पर विरोध से मसीह की कथा सुनाते हैं, यह समझ कर कि मेरी कैद में मेरे लिये क्‍लेश उत्‍पन्‍न करें।

18तो क्‍या हुआ? केवल यह, कि हर प्रकार से चाहे बहाने से, चाहे सच्‍चाई से, मसीह की कथा सुनाई जाती है, और मैं इससे आनन्‍दित हूँ, और आनन्‍दित रहूँगा भी।

19क्‍योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्‍हारी विनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्‍मा के दान के द्वारा इसका प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।

20मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूँ कि मैं किसी बात में लज्‍जित न होऊँ, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसा ही अब भी हो चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।

21क्‍योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।

22पर यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिये लाभदायक है तो मैं नहीं जानता कि किसको चुनूँ।

23क्‍योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूँ; जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूँ, क्‍योंकि यह बहुत ही अच्‍छा है,

24परन्‍तु शरीर में रहना तुम्‍हारे कारण और भी आवश्‍यक है।

25और इसलिये कि मुझे इसका भरोसा है अतः मैं जानता हूँ कि मैं जीवित रहूँगा, वरन् तुम सब के साथ रहूँगा जिससे तुम विश्‍वास में दृढ़ होते जाओ और उसमें आनन्‍दित रहो;

26और जो घमण्‍ड तुम मेरे विषय में करते हो, वह मेरे फिर तुम्‍हारे पास आने से मसीह यीशु में अधिक बढ़ जाए।

27केवल इतना करो कि तुम्‍हारा चाल-चलन मसीह के सुसमाचार के योग्‍य हो कि चाहे मैं आकर तुम्‍हें देखूँ, चाहे न भी आऊँ, तुम्‍हारे विषय में यह सुनूँ कि तुम एक ही आत्‍मा में स्‍थिर हो, और एक चित्त होकर सुसमाचार के विश्‍वास के लिये परिश्रम करते रहते हो।

28और किसी बात में विरोधियों से भय नहीं खाते। यह उनके लिये विनाश का स्‍पष्‍ट चिन्‍ह है, परन्‍तु तुम्‍हारे लिये उद्धार का, और यह परमेश्‍वर की ओर से है।

29क्‍योंकि मसीह के कारण तुम पर यह अनुग्रह हुआ कि न केवल उस पर विश्‍वास करो पर उसके लिये दु:ख भी उठाओ,

30और तुम्‍हें वैसा ही परिश्रम करना है, जैसा तुमने मुझे करते देखा है, और अब भी सुनते हो कि मैं वैसा ही करता हूँ।

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