Mark 52017

1वे झील के पार गिरासेनियों के देश में पहुँचे,

2और जब वह नाव पर से उतरा तो तुरन्‍त एक मनुष्‍य जिसमें अशुद्ध आत्‍मा थी कब्रों से निकलकर उसे मिला।

3वह कब्रों में रहा करता था और कोई उसे साँकलों से भी न बाँध सकता था,

4क्‍योंकि वह बार बार बेडि़यों और साँकलों से बाँधा गया था, पर उसने साँकलों को तोड़ दिया, और बेडि़यों के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे, और कोई उसे वश में नहीं कर सकता था।

5वह लगातार रात-दिन कब्रों और पहाड़ो में चिल्‍लाता, और अपने को पत्‍थरों से घायल करता था।

6वह यीशु को दूर ही से देखकर दौड़ा, और उसे प्रणाम किया।

7और ऊँचे शब्‍द से चिल्‍लाकर कहा, “हे यीशु, परमप्रधान परमेश्‍वर के पुत्र, मुझे तुझ से क्‍या काम? मैं तुझे परमेश्‍वर की शपथ देता हूँ, कि मुझे पीड़ा न दे।”

8क्‍योंकि उसने उससे कहा था, “हे अशुद्ध आत्‍मा, इस मनुष्‍य में से निकल आ।”

9यीशु ने उससे पूछा, “तेरा क्‍या नाम है?” उसने उससे कहा, “मेरा नाम सेना है; क्‍योंकि हम बहुत हैं।”

10और उसने उससे बहुत विनती की, “हमें इस देश से बाहर न भेज।”

11वहाँ पहाड़ पर सूअरों का एक बड़ा झुण्‍ड चर रहा था।

12और उन्‍होंने उससे विनती करके कहा, कि हमें उन सूअरों में भेज दे, कि हम उनके भीतर जाएँ।

13अतः उसने उन्‍हें आज्ञा दी और अशुद्ध आत्‍मा निकलकर सूअरों के भीतर पैठ गई और झुण्‍ड, जो कोई दो हजार का था, कड़ाडे पर से झपटकर झील में जा पड़ा, और डूब मरा।

14और उनके चरवाहों ने भागकर नगर और गाँवों में समाचार सुनाया,

15और जो हुआ था, लोग उसे देखने आए। यीशु के पास आकर, वे उसको जिसमें दुष्टात्माएँ समाई थी, कपड़े पहिने और सचेत बैठे देखकर, डर गए।

16और देखनेवालों ने उसका जिसमें दुष्टात्माएँ थीं, और सूअरों का पूरा हाल, उनको कह सुनाया।

17और वे उससे विनती कर के कहने लगे, कि हमारे सीमा से चला जा।

18और जब वह नाव पर चढ़ने लगा, तो वह जिसमें पहले दुष्‍टात्‍माएँ थीं, उससे विनती करने लगा, कि मुझे अपने साथ रहने दे।

19परन्‍तु उसने उसे आज्ञा न दी, और उससे कहा, “अपने घर जाकर अपने लोगों को बता, कि तुझ पर दया करके प्रभु ने तेरे लिये कैसे बड़े काम किए हैं।”

20वह जाकर दिकापुलिस में इस बात का प्रचार करने लगा, कि यीशु ने मेरे लिये कैसे बड़े काम किए; और सब अचम्‍भा करते थे।

21जब यीशु फिर नाव से पार गया, तो एक बड़ी भीड़ उसके पास इकट्ठी हो गई; और वह झील के किनारे था।

22और याईर नामक आराधनालय के सरदारों में से एक आया, और उसे देखकर, उसके पाँवों पर गिरा।

23और उसने यह कहकर बहुत विनती की, कि मेरी छोटी बेटी मरने पर है: तू आकर उस पर हाथ रख, कि वह चंगी होकर जीवित रहे।

24तब वह उसके साथ चला; और बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली, यहाँ तक कि लोग उस पर गिरे पड़ते थे।

25और एक स्‍त्री, जिस को बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था।

26और जिस ने बहुत वैद्यों से बड़ा दुख उठाया और अपना सब माल व्‍यय करने पर भी कुछ लाभ न उठाया था, परन्‍तु और भी रोगी हो गई थी।

27यीशु की चर्चा सुनकर, भीड़ में उसके पीछे से आई, और उसके वस्‍त्र को छू लिया,

28क्‍योंकि वह कहती थी, “यदि मैं उसके वस्‍त्र ही को छू लूँगी, तो चंगी हो जाऊँगी।”

29और तुरन्‍त उसका लहू बहना बन्‍द हो गया; और उसने अपनी देह में जान लिया, कि मैं उस बीमारी से अच्‍छी हो गई हूँ।

30यीशु ने तुरन्‍त अपने में जान लिया, कि मुझ से सामर्थ्य निकली है, और भीड़ में पीछे फिरकर पूछा, “मेरा वस्‍त्र किसने छूआ?”

31उसके चेलों ने उससे कहा, “तू देखता है, कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ती है, और तू कहता है; कि किसने मुझे छुआ?”

32तब उसने उसे देखने के लिये जिस ने यह काम किया था, चारों ओर दृष्‍टि की।

33तब वह स्‍त्री यह जानकर, कि मेरी कैसी भलाई हुई है, डरती और काँपती हुई आई, और उसके पाँवों पर गिरकर, उससे सब हाल सच सच कह दिया।

34उसने उससे कहा, “पुत्री, तेरे विश्‍वास ने तुझे चंगा किया है: कुशल से जा, और अपनी इस बीमारी से बची रह।”

35वह यह कह ही रहा था, कि आराधनालय के सरदार के घर से लोगों ने आकर कहा, कि तेरी बेटी तो मर गई; अब गुरू को क्‍यों दुख देता है?

36जो बात वे कह रहे थे, उस को यीशु ने अनसुनी करके, आराधनालय के सरदार से कहा, “मत डर; केवल विश्‍वास रख।”

37और उसने पतरस और याकूब और याकूब के भाई यूहन्ना को छोड़, और किसी को अपने साथ आने न दिया।

38और अराधनालय के सरदार के घर में पहुँचकर, उसने लोगों को बहुत रोते और चिल्‍लाते देखा।

39तब उसने भीतर जाकर उनसे कहा, “तुम क्‍यों हल्‍ला मचाते और रोते हो? लड़की मरी नहीं, परन्‍तु सो रही है।”

40वे उसकी हँसी करने लगे, परन्‍तु उसने सब को निकालकर लड़की के माता-पिता और अपने साथियों को लेकर, भीतर जहाँ लड़की पड़ी थी, गया।

41और लड़की का हाथ पकड़कर उससे कहा, ‘तलीता कूमी’; जिस का अर्थ यह है कि ‘हे लड़की, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ’।

42और लड़की तुरन्‍त उठकर चलने फिरने लगी; क्‍योंकि वह बारह वर्ष की थी। और इस पर लोग बहुत चकित हो गए।

43फिर उसने उन्‍हें चिताकर आज्ञा दी कि यह बात कोई जानने न पाए और कहा; कि उसे कुछ खाने को दिया जाए।

Copyright © 2017 Bridge Connectivity Solutions. Released under the Creative Commons Attribution No Derivatives license 4.0.

Choose Translation

Switch translation for Mark 5.

Reading Settings

Paragraph viewDisplay verses as flowing paragraphs instead of individual lines
Show verse numbersDisplay verse numbers inline
Red letterHighlight the words of Christ in red

Sign in to save your reading preferences across sessions.