Luke 72017

1जब वह लोगों को अपनी सारी बातें सुना चुका, तो कफरनहूम में आया।

2और किसी सूबेदार का एक दास जो उसका प्रिय था, बीमारी से मरने पर था।

3उसने यीशु की चर्चा सुनकर यहूदियों के कई पुरनियों को उससे यह विनती करने को उसके पास भेजा, कि आकर मेरे दास को चंगा कर।

4वे यीशु के पास आकर उससे बड़ी विनती करके कहने लगे, “वह इस योग्‍य है, कि तू उसके लिये यह करे,

5क्‍योंकि वह हमारी जाति से प्रेम रखता है, और उसी ने हमारे आराधनालय को बनाया है।”

6यीशु उनके साथ साथ चला, पर जब वह घर से दूर न था, तो सूबेदार ने उसके पास कई मित्रों के द्वारा कहला भेजा, “हे प्रभु दु:ख न उठा, क्‍योंकि मैं इस योग्‍य नहीं, कि तू मेरी छत के तले आए।

7इसी कारण मैंने अपने आप को इस योग्‍य भी न समझा, कि तेरे पास आऊँ, पर वचन ही कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा।

8मैं भी पराधीन मनुष्‍य हूँ; और सिपाही मेरे हाथ में हैं, और जब एक को कहता हूँ, ‘जा,’ तो वह जाता है, और दूसरे से कहता हूँ कि ‘आ,’ तो आता है; और अपने किसी दास को कि ‘यह कर,’ तो वह उसे करता है।”

9यह सुनकर यीशु ने अचम्‍भा किया, और उसने मुँह फेरकर उस भीड़ से जो उसके पीछे आ रही थी कहा, “मैं तुम से कहता हूँ, कि मैं ने इस्राएल में भी ऐसा विश्‍वास नहीं पाया।”

10और भेजे हुए लोगों ने घर लौटकर, उस दास को चंगा पाया।

11थोड़े दिन के बाद वह नाईन नाम के एक नगर को गया, और उसके चेले, और बड़ी भीड़ उसके साथ जा रही थी।

12जब वह नगर के फाटक के पास पहुँचा, तो देखो, लोग एक मुर्दा को बाहर लिए जा रहे थे; जो अपनी माँ का एकलौता पुत्र था, और वह विधवा थी: और नगर के बहुत से लोग उसके साथ थे।

13उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उसने कहा, “मत रो।”

14तब उसने पास आकर अर्थी को छुआ; और उठानेवाले ठहर गए, तब उसने कहा, “हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!”

15तब वह मुर्दा उठ बैठा, और बोलने लगा: और उसने उसे उसकी माँ को सौप दिया।

16इस से सब पर भय छा गया; और वे परमेश्‍वर की बड़ाई करके कहने लगे, “हमारे बीच में एक बड़ा भविष्‍यद्वक्‍ता उठा है, और परमेश्‍वर ने अपने लोगों पर कृपा दृष्‍टि की है।”

17और उसके विषय में यह बात सारे यहूदिया और आस-पास के सारे देश में फैल गई।।

18और यूहन्‍ना को उसके चेलों ने इन सब बातों का समचार दिया।

19तब यूहन्‍ना ने अपने चेलों में से दो को बुलाकर प्रभु के पास यह पूछने के लिये भेजा, “क्‍या आनेवाला तू ही है, या हम किसी और दूसरे की बाट देखें?”

20उन्होंने उसके पास आकर कहा, “यूहन्‍ना बपतिस्‍मा देनेवाले ने हमें तेरे पास यह पूछने को भेजा है, कि क्‍या आनेवाला तू ही है, या हम दूसरे की बाट जोहें?”

21उसी घड़ी उसने बहुतों को बीमारियों और पीड़ाओं, और दुष्‍टात्‍माओं से छुड़ाया; और बहुत से अन्‍धों को आँखे दी।

22और उसने उनसे कहा, “जो कुछ तुम ने देखा और सुना है, जाकर यूहन्‍ना से कह दो; कि अन्‍धे देखते हैं, लंगड़े चलते-फिरते हैं, कोढ़ी शुद्ध किए जाते हैं, बहरे सुनते है, और मुर्दे जिलाए जाते है, और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।

23“धन्‍य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए।”

24जब यूहन्‍ना के भेजे हुए लोग चल दिए, तो यीशु यूहन्‍ना के विषय में लोगों से कहने लगा, “तुम जंगल में क्‍या देखने गए थे? क्‍या हवा से हिलते हुए सरकण्‍डे को?

25“तो तुम फिर क्‍या देखने गए थे? क्‍या कोमल वस्‍त्र पहने हुए मनुष्‍य को? देखो, जो भड़कीला वस्‍त्र पहनते, और सुख-विलास से रहते हैं, वे राजभवनों में रहते हैं।

26“तो फिर क्‍या देखने गए थे? क्‍या किसी भविष्‍यद्वक्‍ता को? हाँ, मैं तुम से कहता हूँ, वरन भविष्‍यद्वक्‍ता से भी बड़े को।

27“यह वही है, जिसके विषय में लिखा है: “देख, मैं अपने दूत को तेरे आगे-आगे भेजता हूँ, जो तेरे आगे मार्ग सीधा करेगा।”

28“मैं तुम से कहता हूँ, कि जो स्‍त्रियों से जन्‍में हैं, उनमें से यूहन्‍ना से बड़ा कोई नहीं: पर जो परमेश्‍वर के राज्‍य में छोटे से छोटा है, वह उससे भी बड़ा है।”

29और सब साधारण लोगों ने सुनकर और चुंगी लेनेवालों ने भी यूहन्‍ना का बपतिस्‍मा लेकर परमेश्‍वर को सच्‍चा मान लिया।

30पर फरीसियों और व्‍यवस्‍थापकों ने उससे बपतिस्‍मा न लेकर परमेश्‍वर की मनसा को अपने विषय में टाल दिया।

31“अतः मैं इस युग के लोगों की उपमा किस से दूँ कि वे किस के नाई हैं?

32“वे उन बालकों के नाई हैं जो बाजार में बैठे हुए एक दूसरे से पुकारकर कहते हैं, ‘हम ने तुम्‍हारे लिये बाँसली बजाई, और तुम न नाचे, हम ने विलाप किया, और तुम न रोए!’

33“क्‍योंकि यूहन्‍ना बपतिस्‍मा देनेवाला न रोटी खाता आया, न दाखरस पीता आया, और तुम कहते हो, उसमें दुष्‍टात्‍मा है।

34“मनुष्‍य का पुत्र खाता-पीता आया है; और तुम कहते हो, ‘देखो, पेटू और पियक्‍कड़ मनुष्‍य, चुंगी लेनेवालों का और पापियों का मित्र।’

35“पर ज्ञान अपनी सब सन्‍तानों से सच्‍चा ठहराया गया है।”

36फिर किसी फरीसी ने उससे विनती की, कि मेरे साथ भोजन कर; अतः वह उस फरीसी के घर में जाकर भोजन करने बैठा।

37और देखो, उस नगर की एक पापिनी स्‍त्री यह जानकर कि वह फरीसी के घर में भोजन करने बैठा है, संगमरमर के पात्र में इत्र लाई।

38और उसके पाँवो के पास, पीछे खड़ी होकर, रोती हुई, उसके पाँवो को आँसुओं से भिगाने और अपने सिर के बालों से पोंछने लगी और उसके पाँव बार-बार चूमकर उन पर इत्र मला।

39यह देखकर, वह फरीसी जिस ने उसे बुलाया था, अपने मन में सोचने लगा, “यदि यह भविष्‍यद्वक्‍ता होता तो जान जाता, कि यह जो उसे छू रही है, वह कौन और कैसी स्‍त्री है? क्‍योंकि वह तो पापिन है।”

40यह सुन यीशु ने उसके उत्तर में कहा, “हे शमौन, मुझे तुझ से कुछ कहना है।” वह बोला, “हे गुरू, कह।”

41“किसी महाजन के दो देनदार थे, एक पाँच सौ, और दूसरा पचास दीनार देनदार था।

42“जब कि उनके पास वापस लौटाने को कुछ न रहा, तो उसने दोनो को क्षमा कर दिया। अतः उनमें से कौन उससे अधिक प्रेम रखेगा।

43शमौन ने उत्तर दिया, “मेरी समझ में वह, जिसका उसने अधिक छोड़ दिया।” उसने उससे कहा, “तू ने ठीक विचार किया है।”

44और उस स्‍त्री की ओर फिरकर उसने शमौन से कहा, “क्‍या तू इस स्‍त्री को देखता है? मैं तेरे घर में आया परन्‍तु तू ने मेरे पाँव धाने के लिये पानी न दिया, पर इस ने मेरे पाँव आँसुओं से भिगाए, और अपने बालों से पोंछा।”

45“तू ने मुझे चूमा न दिया, पर जब से मैं आया हूँ तब से इसने मेरे पाँवो का चूमना न छोड़ा।

46“तू ने मेरे सिर पर तेल नहीं मला; पर इसने मेरे पाँवो पर इत्र मला है।

47“इसलिये मैं तुझ से कहता हूँ; कि इसके पाप जो बहुत थे, क्षमा हुए, क्‍योंकि इस ने बहुत प्रेम किया; पर जिसका थोड़ा क्षमा हुआ है, वह थोड़ा प्रेम करता है।”

48और उसने स्‍त्री से कहा, “तेरे पाप क्षमा हुए।”

49तब जो लोग उसके साथ भोजन करने बैठे थे, वे अपने-अपने मन में सोचने लगे, “यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?”

50पर उसने स्‍त्री से कहा, “तेरे विश्‍वास ने तुझे बचा लिया है, कुशल से चली जा।”

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