Luke 102017

1और इन बातों के बाद प्रभु ने सत्तर और मनुष्‍य नियुक्‍त किए और जिस-जिस नगर और जगह को वह आप जाने पर था, वहाँ उन्‍हें दो-दो करके अपने आगे भेजा।

2और उसने उनसे कहा, “पक्‍के खेत बहुत हैं; परन्‍तु मजदूर थोड़े हैं: इसलिये खेत के स्‍वामी से विनती करो, कि वह अपने खेत काटने को मजदूर भेज दे।

3“जाओ; देखों मैं तुम्‍हें भेड़ों के नाई भेड़ियों के बीच में भेजता हूँ।

4“इसलिये न बटुआ, न झोली, न जूते लो; और न मार्ग में किसी को नमस्‍कार करो।

5“जिस किसी घर में जाओ, पहले कहो, ‘इस घर पर कल्‍याण हो।’

6“यदि वहाँ कोई कल्‍याण के योग्‍य होगा; तो तुम्‍हारा कल्‍याण उस पर ठहरेगा, नहीं तो तुम्‍हारे पास लौट आएगा।

7“उसी घर में रहो, और जो कुछ उनसे मिले, वही खाओ-पीओ, क्‍योंकि मजदूर को अपनी मजदूरी मिलनी चाहिए; घर-घर न फिरना।

8“और जिस नगर में जाओ, और वहाँ के लोग तुम्‍हें उतारें, तो जो कुछ तुम्‍हारे सामने रखा जाए वही खाओ।

9“वहाँ के बीमारों को चंगा करो: और उनसे कहो, ‘परमेश्‍वर का राज्‍य तुम्‍हारे निकट आ पहुँचा है।’

10“परन्‍तु जिस नगर में जाओ, और वहाँ के लोग तुम्‍हें ग्रहण न करें, तो उसके बाजारों में जाकर कहो,

11‘तुम्‍हारे नगर की धूल भी, जो हमारे पाँवो में लगी है, हम तुम्‍हारे सामने झाड़ देते हैं, तौभी यह जान लो, कि परमेश्‍वर का राज्‍य तुम्‍हारे निकट आ पहुँचा है।’

12“मैं तुम से कहता हूँ, कि उस दिन उस नगर की दशा से सदोम की दशा सहने योग्‍य होगी।

13“हाय खुराजीन! हाय बैतसैदा! जो सामर्थ्य के काम तुम में किए गए, यदि वे सूर और सैदा में किए जाते, तो टाट ओढ़कर और राख में बैठकर वे कब के मन फिराते।

14“परन्‍तु न्‍याय के दिन तुम्‍हरी दशा से सूर और सैदा की दशा अधिक सहने योग्‍य होगी।

15“और हे कफरनहूम, क्‍या तू स्‍वर्ग तक ऊँचा किया जाएगा? तू तो अधोलोक तक नीचे जाएगा।

16“जो तुम्‍हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है, और जो तुम्‍हें तुच्‍छ जानता है, वह मुझे तुच्‍छ जानता है; और जो मुझे तुच्‍छ जानता है, वह मेरे भेजनेवाले को तुच्‍छ जानता है।”

17वे सत्तर आनन्‍द से फिर आकर कहने लगे, “हे प्रभु, तेरे नाम से दुष्‍टात्‍मा भी हमारे वश में है।”

18उसने उनसे कहा, “मैं शैतान को बिजली के नाई स्‍वर्ग से गिरा हुआ देख रहा था।”

19“देखो, मैने तुम्‍हे साँपों और बिच्‍छुओं को रौंदने का, और शत्रु की सारी सामर्थ्य पर अधिकार दिया है; और किसी वस्‍तु से तुम्‍हें कुछ हानि न होगी।

20“तौभी इस से आनन्‍दित मत हो, कि आत्‍मा तुम्‍हारे वश में हैं, परन्‍तु इस से आनन्‍दित हो कि तुम्‍हारे नाम स्‍वर्ग पर लिखे हैं।”

21उसी घड़ी वह पवित्र आत्‍मा में होकर आनन्‍द से भर गया, और कहा, “हे पिता, स्‍वर्ग और पृथ्‍वी के प्रभु, मैं तेरा धन्‍यवाद करता हूँ, कि तू ने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रगट किया: हाँ, हे पिता, क्‍योंकि तुझे यही अच्‍छा लगा।

22“मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंप दिया है; और कोई नहीं जानता कि पुत्र कौन है केवल पिता और पिता कौन है यह भी कोई नहीं जानता, केवल पुत्र के और वह जिस पर पुत्र उसे प्रकट करना चाहे।”

23और चेलों की ओर मुड़कर अकेले में कहा, “धन्‍य हैं वे आँखे, जो ये बाते जो तुम देखते हो देखती हैं,

24क्‍योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि बहुत से भविष्‍यद्वक्‍ताओं और राजाओं ने चाहा, कि जो बातें तुम देखते हो देखें; पर न देखीं और जो बातें तुम सुनते हो सुनें, पर न सुनीं।”

25और देखो, एक व्‍यवस्‍थापक उठा; और यह कहकर, उसकी परीक्षा करने लगा, “हे गुरू, अनन्‍त जीवन का वारिस होने के लिये मैं क्‍या करूँ?”

26उसने उससे कहा, “व्‍यवस्‍था में क्‍या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?”

27उसने उत्तर दिया, “तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने नाई प्रेम रख।”

28उसने उससे कहा, “तू ने ठीक उत्तर दिया, यही कर तो तू जीवित रहेगा।”

29परन्‍तु उसने अपने आप को धर्मी ठहराने की इच्‍छा से यीशु से पूछा, “तो मेरा पड़ोसी कौन है?”

30यीशु ने उत्तर दिया “एक मनुष्‍य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था, कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिए, और मार पीटकर उसे अधमरा छोड़कर चले गए।

31“और ऐसा हुआ कि उसी मार्ग से एक याजक जा रहा था, परन्‍तु उसे देख कर कतराकर चला गया।

32“इसी रीति से एक लेवी उस जगह पर आया, वह भी उसे देख कर कतराकर चला गया।

33“परन्‍तु एक सामरी यात्री वहाँ आ निकला, और उसे देखकर तरस खाया।

34और उसके पास आकर और उसके घावों पर तेल और दाखरस डालकर पट्टियाँ बाँधी, और अपनी सवारी पर चढ़ाकर सराय में ले गया, और उसकी सेवा टहल की।

35“दूसरे दिन उसने दो दिनार निकालकर सराय के मालिक को दिए, और कहा, ‘इस की सेवा टहल करना, और जो कुछ तेरा और लगेगा, वह मैं लौटने पर तुझे दे दूँगा।’

36“अब तेरी समझ में जो डाकुओं में घिर गया था, इन तीनों में से उसका पड़ोसी कौन ठहरा?”

37उसने कहा, “वही जिस ने उस पर तरस खाया।” यीशु ने उससे कहा, “जा, तू भी ऐसा ही कर।”

38फिर जब वे जा रहे थे, तो वह एक गाँव में गया, और मार्था नाम एक स्‍त्री ने उसे अपने घर में उतारा।

39और मरियम नामक उसकी एक बहन थी; वह प्रभु के पाँवो के पास बैठकर उसका वचन सुनती थी।

40परन्तु मार्था सेवा करते-करते घबरा गई और उसके पास आकर कहने लगी, “हे प्रभु, क्‍या तुझे कुछ भी चिन्ता नहीं कि मेरी बहन ने मुझे सेवा करने के लिये अकेली ही छोड़ दिया है?” इसलिए उससे कह, मेरी सहायता करे।”

41प्रभु ने उसे उत्तर दिया, “मार्था, हे मार्था; तू बहुत बातों के लिये चिन्‍ता करती और घबराती है।

42परन्‍तु एक बात अवश्‍य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है: जो उससे छीना न जाएगा।”

Copyright © 2017 Bridge Connectivity Solutions. Released under the Creative Commons Attribution No Derivatives license 4.0.

Choose Translation

Switch translation for Luke 10.

Reading Settings

Paragraph viewDisplay verses as flowing paragraphs instead of individual lines
Show verse numbersDisplay verse numbers inline
Red letterHighlight the words of Christ in red

Sign in to save your reading preferences across sessions.