John 122017

1फिर यीशु फतह से छ: दिन पहले बैतनिय्‍याह में आया, जंहा लाजर था: जिसे यीशु ने मरे हुओं में से जिलाया था।

2वहाँ उन्होंने उसके लिये भोजन तैयार किया, और मरथा सेवा कर रही थी, और लाजर उन में से एक था, जो उसके साथ भोजन करने के लिये बैठे थे।

3तब मरियम ने जटामासी का आध सेर बहुमोल इत्र लेकर यीशु के पाँवों पर डाला, और अपने बालों से उसके पाँव पोंछे, और इत्र की सुगंध से घर सुगन्‍धित हो गया।

4परन्‍तु उसके चेलों में से यहूदा इस्‍करियोती नाम एक चेला जो उसे पकड़वाने पर था, कहने लगा,

5“यह इत्र तीन सौ दीनार में बेचकर कंगालों को क्‍यों न दिया गया?”

6उसने यह बात इसलिये न कही, कि उसे कंगालों की चिन्‍ता थी, परन्‍तु इसलिये कि वह चोर था और उसके पास उनकी थैली रहती थी, और उसमें जो कुछ डाला जाता था, वह निकाल लेता था।

7यीशु ने कहा, “उसे मेरे गाड़े जाने के दिन के लिये रहने दे।

8क्‍योंकि कंगाल तो तुम्‍हारे साथ सदा रहते हैं, परन्‍तु मैं तुम्‍हारे साथ सदा न रहूँगा।” लाजर को मार डालने का निर्णय

9यहूदियों में से साधारण लोग जान गए, कि वह वहाँ है, और वे न केवल यीशु के कारण आए परन्‍तु इसलिये भी कि लाजर को देंखें, जिसे उसने मरे हुओं में से जिलाया था।

10तब महायाजकों ने लाजर को भी मार डालने की सम्‍मति की।

11क्‍योंकि उसके कारण बहुत से यहूदी चले गए, और यीशु पर विश्‍वास किया। यीशु का यरूशलेम में विजय-प्रवेश

12दूसरे दिन बहुत से लोगों ने जो पर्व में आए थे, यह सुनकर, कि यीशु यरूशलेम में आरहा है।

13इसलिए उन्होंने खजूर की, डालियाँ लेीं, और उससे भेंट करने को निकले, और पुकारने लगे, “होशाना! धन्‍य इस्राएल का राजा, जो प्रभु के नाम से आता है।”

14जब यीशु को एक गदहे का बच्‍चा मिला, तो उस पर बैठा, जैसा लिखा है,

15“हे सिय्‍योन की बेटी, मत डर; देख, तेरा राजा गदहे के बच्‍चे पर चढ़ा हुआ चला आता है।”

16उसके चेले, ये बातें पहले न समझे थे; परन्‍तु जब यीशु की महिमा प्रगट हुई, तो उनको स्‍मरण आया, कि ये बातें उसके विषय में लिखी हुई थीं; और लोगों ने उससे इस प्रकार का व्‍यवहार किया था।

17तब भीड़ के लोगों ने जो उस समय उसके साथ थे यह गवाही दी कि उसने लाजर को कब्र में से बुलाकर, मरे हुओं में से जिलाया था।

18इसी कारण लोग उससे भेंट करने को आए थे क्‍योंकि उन्होंने सुना था, कि उसने यह आश्‍चर्यकर्म दिखाया है।

19तब फरीसियों ने आपस में कहा, “सोचो तो सही कि तुम से कुछ नहीं बन पड़ता: देखो, संसार उसके पीछे हो चला है।”

20जो लोग उस पर्व में भजन करने आए थे उन में से कई यूनानी थे।

21उन्होंने गलील के बैतसैदा के रहनेवाले फिलिप्‍पुस के पास आकर उससे विनती की, “श्रीमान् हम यीशु से भेंट करना चाहते हैं।”

22फिलिप्‍पुस ने आकर अद्रियास से कहा; तब अन्‍द्रियास और फिलिप्‍पुस ने यीशु से कहा।

23इस पर यीशु ने उनसे कहा, “वह समय आ गया है, कि मनुष्‍य के पुत्र कि महिमा हो।

24मैं तुम से सच सच कहता हूँ, कि जब तक गेहूँ का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्‍तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है।

25जो अपने प्राण को प्रिय जानता है, वह उसे खो देता है; और जो इस जगत में अपने प्राण को अप्रिय जानता है; वह अनन्‍त जीवन के लिये उसकी रक्षा करेगा।

26यदि कोई मेरी सेवा करे, तो मेरे पीछे हो ले; और जहाँ मैं हूँ वहाँ मेरा सेवक भी होगा; यदि कोई मेरी सेवा करे, तो पिता उसका आदर करेगा।

27“अब मेरा जी व्‍याकुल हो रहा है। इसलिये अब मैं क्‍या कहूँ? ‘हे पिता, मुझे इस घड़ी से बचा?’ परन्‍तु मैं इसी कारण इस घड़ी को पहुँचा हूँ।

28हे पिता अपने नाम की महिमा कर।” तब यह आकाशवाणी हुई, “मैंने उसकी महिमा की है, और फिर भी करूँगा।”

29तब जो लोग खड़े हुए सुन रहे थे, उन्होंने कहा; कि बादल गरजा, औरों ने कहा, “कोई स्‍वर्गदूत उससे बोला।”

30इस पर यीशु ने कहा, “यह शब्‍द मेरे लिये नहीं परन्‍तु तुम्‍हारे लिये आया है।

31अब इस जगत का न्‍याय होता है, अब इस जगत का सरदार निकाल दिया जाएगा।

32और मैं यदि पृथ्‍वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया जाउँगा, तो सब को अपने पास खीचूँगा।”

33ऐसा कहकर उसने यह प्रगट कर दिया, कि वह कैसी मृत्‍यु से मरेगा।

34इस पर लोगों ने उससे कहा, “हम ने व्‍यवस्‍था की यह बात सुनी है, कि मसीह सर्वदा रहेगा, फिर तू क्‍यों कहता है, कि मनुष्‍य के पुत्र को ऊँचे पर चढ़ाया जाना अवश्‍य है? यह मनुष्‍य का पुत्र कौन है?”

35यीशु ने उनसे कहा, “ज्‍योति अब थोड़ी देर तक तुम्‍हारे बीच में है, जब तक ज्‍योति तुम्‍हारे साथ है तब तक चले चलो; ऐसा न हो कि अन्‍धकार तुम्‍हें आ घेरे; जो अन्‍धकार में चलता है वह नहीं जानता कि किधर जाता है।

36जब तक ज्‍योति तुम्‍हारे साथ है, ज्‍योति पर विश्‍वास करो कि तुम ज्‍योति के सन्‍तान होओ।” ये बातें कहकर यीशु चला गया और उनसे छिपा रहा।

37और उसने उनके साम्‍हने इतने चिन्‍ह दिखाए, तौभी उन्होंने उस पर विश्‍वास न किया;

38ताकि यशायाह भविष्‍यद्वक्‍ता का वचन पूरा हो जो उसने कहा: “हे प्रभु, हमारे समाचार पर किस ने प्रतीति की है? और प्रभु का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?”

39इस कारण वे विश्‍वास न कर सके, क्‍योंकि यशायाह ने यह भी कहा है:

40“उसने उनकी आँखें अन्‍धी, और उन का मन कठोर किया है; कहीं ऐसा न हो, कि आँखों से देखें, और मन से समझें, और फिरें, और मैं उन्‍हें चंगा करूँ।”

41यशायाह ने ये बातें इसलिये कहीं, कि उसने उसकी महिमा देखी; और उसने उसके विषय में बातें की।

42तौभी सरदारों में से भी बहुतों ने उस पर विश्‍वास किया, परन्‍तु फरीसियों के कारण प्रगट में नहीं मानते थे, ऐसा न हो कि आराधनालय में से निकाले जाएँ।

43क्‍योंकि मनुष्‍यों की प्रशंसा उनको परमेश्‍वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।

44यीशु ने पुकारकर कहा, “जो मुझ पर विश्‍वास करता है, वह मुझ पर नहीं, वरन मेरे भेजनेवाले पर विश्‍वास करता है।

45और जो मुझे देखता है, वह मेरे भेजनेवाले को देखता है।

46मैं जगत में ज्‍योति होकर आया हूँ ताकि जो कोई मुझ पर विश्‍वास करे, वह अन्‍धकार में न रहे।

47यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता, क्‍योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्‍तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ।

48जो मुझे तुच्‍छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वह पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा।

49क्‍योंकि मैं ने अपनी ओर से बातें नहीं कीं, परन्‍तु पिता जिस ने मुझे भेजा है उसी ने मुझे आज्ञा दी है, कि क्‍या क्‍या कहूँ और क्‍या क्‍या बोलूं?

50और मैं जानता हूँ, कि उसकी आज्ञा अनन्‍त जीवन है इसलिये मैं जो बोलता हूँ, वह जैसा पिता ने मुझ से कहा है वैसा ही बोलता हूँ।”

Copyright © 2017 Bridge Connectivity Solutions. Released under the Creative Commons Attribution No Derivatives license 4.0.

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