Hebrews 72017

1यह मलिकिसिदक शालेम का राजा, और परमप्रधान परमेश्‍वर का याजक, सर्वदा याजक बना रहता है; जब अब्राहम राजाओं को मारकर लौटा जाता था, तो इसी ने उससे भेंट करके उसे आशीष दी,

2इसी को अब्राहम ने सब वस्‍तुओं का दसवाँ अंश भी दिया: यह पहले अपने नाम के अर्थ के अनुसार, धर्म का राजा और फिर शालेम अर्थात् शान्‍ति का राजा है।

3जिस का न पिता, न माता, न वंशावली है, जिस के न दिनों का आदि है और न जीवन का अन्‍त है; परन्‍तु परमेश्‍वर के पुत्र के स्‍वरूप ठहरकर वह सदा के लिए याजक बना रहता है।

4अब इस पर ध्‍यान करो कि यह कैसा महान था जिस को कुलपिता अब्राहम ने अच्‍छे से अच्‍छे माल की लूट का दसवाँ अंश दिया।

5लेवी की संतान में से जो याजक का पद पाते हैं, उन्‍हें आज्ञा मिली है, कि लोगों, अर्थात् अपने भाइयों से चाहे, वे अब्राहम ही की देह से क्‍यों न जन्‍में हों, व्‍यवस्‍था के अनुसार दसवाँ अंश लें।

6पर इस ने, जो उन की वंशावली में का भी न था अब्राहम से दसवाँ अंश लिया और जिसे प्रतिज्ञाएँ मिली थी उसे आशीष दी।

7और उस में संदेह नहीं, कि छोटा बड़े से आशीष पाता है।

8और यहाँ तो मरनहार मनुष्‍य दसवाँ अंश लेते हैं पर वहाँ वही लेता है, जिस की गवाही दी जाती है, कि वह जीवित है।

9तो हम यह भी कह सकते हैं, कि लेवी ने भी, जो दसवाँ अंश लेता है, अब्राहम के द्वारा दसवाँ अंश दिया।

10क्‍योंकि जिस समय मलिकिसिदक ने उसके पिता से भेंट की, उस समय यह अपने पिता की देह में था।

11तब यदि लेवीय याजक पद के द्वारा सिद्धि हो सकती है (जिस के सहारे से लोगों को व्‍यवस्‍था मिली थी) तो फिर क्‍या आवश्‍यकता थी, कि दूसरा याजक मलिकिसिदक की रीति पर खड़ा हो, और हारून की रीति का न कहलाए?

12क्‍योंकि जब याजक का पद बदला जाता है? तो व्‍यवस्‍था का भी बदलना अवश्‍य है।

13क्‍योंकि जिस के विषय में ये बातें कही जाती हैं कि वह दूसरे गोत्र का है, जिस में से किसी ने वेदी की सेवा नहीं की।

14तो प्रगट है, कि हमारा प्रभु यहूदा के गोत्र में से उदय हुआ है और इस गोत्र के विषय में मूसा ने याजक पद की कुछ चर्चा नहीं की।

15और जब मलिकिसिदक के समान एक और ऐसा याजक उत्‍पन्‍न होनेवाला था।

16जो शारीरिक आज्ञा की व्‍यवस्‍था के अनुसार नहीं, पर अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार नियुक्‍त हो तो हमारा दावा और भी स्‍पष्‍टता से प्रगट हो गया।

17क्‍योंकि उसके विषय में यह गवाही दी गई है, “तू मलिकिसिदक की रीति पर युगानुयुग याजक है।”

18निदान, पहिली आज्ञा निर्बल; और निष्‍फल होने के कारण लोप हो गई।

19(इसलिये कि व्‍यवस्‍था ने किसी बात की सिद्धि नहीं कि) और उसके स्‍थान पर एक ऐसी उत्तम आशा रखी गई है जिस के द्वारा हम परमेश्‍वर के समीप जा सकते हैं।

20और इसलिये कि मसीह की नियुक्ति बिना शपथ नहीं हुई।

21(क्‍योंकि वे तो बिना शपथ याजक ठहराए गए पर यह शपथ के साथ उस की ओर से नियुक्‍त किया गया जिस ने उसके विषय में कहा, “प्रभु ने शपथ खाई, और वह उससे फिर न पछताएगा, कि तू युगानुयुग याजक है”)।

22सो यीशु एक उत्तम वाचा का जामिन ठहरा।

23वे तो बहुत से याजक बनते आए, इस का कारण यह था कि मृत्‍यु उन्‍हें रहने नहीं देती थी।

24पर यह युगानुयुग रहता है; इस कारण उसका याजक पद अटल है।

25इसी लिये जो उसके द्वारा परमेश्‍वर के पास आते हैं, वह उन का पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्‍योंकि वह उन के लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।

26सो ऐसा ही महायाजक हमारे योग्‍य था, जो पवित्र, और निष्‍कपट और निर्मल, और पापियों से अलग, और स्‍वर्ग से भी ऊँचा किया हुआ हो।

27और उन महायाजकों की नाई उसे आवश्‍यक नहीं कि प्रति दिन पहले अपने पापों और फिर लोगों के पापों के लिये बलिदान चढ़ाए; क्‍योंकि उसने अपने आप को बलिदान चढ़ाकर उसे एक ही बार निपटा दिया।

28क्‍योंकि व्‍यवस्‍था तो निर्बल मनुष्‍यों को महायाजक नियुक्‍त करती है; परन्‍तु उस शपथ का वचन जो व्‍यवस्‍था के बाद खाई गई, उस पुत्र को नियुक्‍त करता है जो युगानुयुग के लिये सिद्ध किया गया है।

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