Acts 202017

1जब हुल्‍लड़ थम गया तो पौलुस ने चेलों को बुलवाकर समझाया, और उनसे विदा होकर मकिदुनिया की ओर चल दिया।

2उस सारे प्रदेश में से होकर और चेलों को बहुत उत्साहित कर वह यूनान में आया।

3जब तीन महीने रहकर वह वहाँ से जहाज पर सीरिया की ओर जाने पर था, तो यहूदी उसकी घात में लगे, इसलिये उसने यह निश्चय किया कि मकिदुनिया होकर लौट जाए।

4बिरीया के पुरूर्स का पुत्र सोपत्रुस और थिस्‍सलुनीकियों में से अरिस्‍तर्खुस और सिकुन्‍दुस और दिरबे का गयुस, और तीमुथियुस और आसिया का तुखिकुस और त्रुफिमुस आसिया तक उसके साथ हो लिए।

5वे आगे जाकर त्रोआस में हमारी बाट जोहते रहे।

6और हम अखमीरी रोटी के दिनों के बाद फिलिप्‍पी से जहाज पर चढ़कर पाँच दिन में त्रोआस में उनके पास पहुँचे, और सात दिन तक वहीं रहे।

7सप्‍ताह के पहले दिन जब हम रोटी तोड़ने के लिये इकट्ठे हुए, तो पौलुस ने जो दूसरे दिन चले जाने पर था, उनसे बातें की, और आधी रात तक उपदेश देता रहा।

8जिस अटारी पर हम इकट्ठे थे, उसमें बहुत दीये जल रहे थे।

9और यूतुखुस नाम का एक जवान खिड़की पर बैठा हुआ गहरी नींद से झुक रहा था, और जब पौलुस देर तक बातें करता रहा तो वह नींद के झोके में तीसरी अटारी पर से गिर पड़ा, और मरा हुआ उठाया गया।

10परन्‍तु पौलुस उतरकर उससे लिपट गया, और गले लगाकर कहा, “घबराओ नहीं; क्‍योंकि उसका प्राण उसी में है।”

11और ऊपर जाकर रोटी तोड़ी और खाकर इतनी देर तक उनसे बातें करता रहा कि पौ फट गई; फिर वह चला गया।

12और वे उस जवान को जीवित ले आए, और बहुत शान्‍ति पाई।

13हम पहले से जहाज पर चढ़कर अस्‍सुस को इस विचार से आगे गए, कि वहाँ से हम पौलुस को चढ़ा लें क्‍योंकि उसने यह इसलिये ठहराया था, कि आप ही पैदल जानेवाला था।

14जब वह अस्‍सुस में हमें मिला तो हम उसे चढ़ाकर मितुलेने में आए।

15और वहाँ से जहाज खोलकर हम दूसरे दिन खियुस के सामने पहुँचे, और अगले दिन सामुस में जा पहुंचे, फिर दूसरे दिन मिलेतुस में आए।

16क्‍योंकि पौलुस ने इफिसुस के पास से होकर जाने की ठानी थी, कि कहीं ऐसा न हो, कि उसे आसिया में देर लगे; क्‍योंकि वह जल्‍दी में था, कि यदि हो सके, तो वह पिन्‍तेकुस्त के दिन यरूशलेम में रहे।

17और उसने मिलेतुस से इफिसुस में कहला भेजा, और कलीसिया के प्राचीनों को बुलवाया।

18जब वे उस के पास आए, तो उनसे कहा, “तुम जानते हो, कि पहले ही दिन से जब मैं आसिया में पहुँचा, मैं हर समय तुम्‍हारे साथ किस प्रकार रहा।

19अर्थात् बड़ी दीनता से, और आँसू बहा-बहाकर, और उन परीक्षाओं में जो यहूदियों के षड्यंत्र के कारण मुझ पर आ पड़ी; मैं प्रभु की सेवा करता ही रहा।

20और जो-जो बातें तुम्‍हारे लाभ की थीं, उनको बताने और लोगों के सामने और घर-घर सिखाने से कभी न झिझका।

21वरन् यहूदियों और यूनानियों के सामने गवाही देता रहा कि परमेश्‍वर की ओर मन फिराना, और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास करना चाहिए।

22और अब देखो, मैं आत्‍मा में बंधा हुआ यरूशलेम को जाता हूँ, और नहीं जानता, कि वहाँ मुझ पर क्‍या-क्‍या बीतेगा,

23केवल यह कि पवित्र आत्‍मा हर नगर में गवाही दे-देकर मुझ से कहता है कि बन्‍धन और क्‍लेश तेरे लिये तैयार है।

24परन्‍तु मैं अपने प्राण को कुछ नहीं समझता कि उसे प्रिय जानूँ, वरन् यह कि मैं अपनी दौड़ को, और उस सेवा को पूरी करूँ, जो मैंने परमेश्‍वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिये प्रभु यीशु से पाई है।

25और अब देखो, मैं जानता हूँ, कि तुम सब जिनमें मैं परमेश्‍वर के राज्‍य का प्रचार करता फिरा, मेरा मुँह फिर न देखोगे।

26इसलिये मैं आज के दिन तुम से गवाही देकर कहता हूँ, कि मैं सब के लहू से निर्दोष हूँ।

27क्‍योंकि मैं परमेश्‍वर की सारी मनसा को तुम्‍हें पूरी रीति से बताने से न झिझका।

28इसलिये अपनी और पूरे झुण्ड की चौकसी करो; जिसमें पवित्र आत्‍मा ने तुम्‍हें अध्‍यक्ष ठहराया है कि तुम परमेश्‍वर की कलीसिया की रखवाली करो, जिसे उसने अपने लहू से मोल लिया है।

29मैं जानता हूँ, कि मेरे जाने के बाद फाड़नेवाले भेड़िए तुम में आएँगे, जो झुण्ड को न छोड़ेंगे।

30तुम्‍हारे ही बीच में से भी ऐसे-ऐसे मनुष्‍य उठेंगे, जो चेलों को अपने पीछे खींच लेने को टेढ़ी-मेढ़ी बातें कहेंगे।

31इसलिये जागते रहो, और स्‍मरण करो कि मैंने तीन वर्ष तक रात दिन आँसू बहा-बहाकर, हर एक को सचेत देना न छोड़ा।

32और अब मैं तुम्‍हें परमेश्‍वर को, और उसके अनुग्रह के वचन को सौंप देता हूँ; जो तुम्‍हारी उन्‍नति कर सकता है, और सब पवित्र किये गये लोगों में साझी करके मीरास दे सकता है।

33मैंने किसी के चाँदी, सोने या कपड़े का लालच नहीं किया।

34तुम आप ही जानते हो कि इन्‍हीं हाथों ने मेरी और मेरे साथियों की आवश्‍यकताएँ पूरी की।

35मैंने तुम्‍हें सब कुछ करके दिखाया, कि इस रीति से परिश्रम करते हुए निर्बलों को सम्‍भालना, और प्रभु यीशु की बातें स्‍मरण रखना अवश्‍य है, कि उसने आप ही कहा है: ‘लेने से देना धन्‍य है’।”

36यह कहकर उसने घुटने टेके और उन सब के साथ प्रार्थना की।

37तब वे सब बहुत रोए और पौलुस के गले लिपट कर उसे चूमने लगे।

38वे विशेष करके इस बात का शोक करते थे, जो उसने कही थी, कि तुम मेरा मुँह फिर न देखोगे। और उन्होंने उसे जहाज तक पहुँचाया।

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