Acts 162017

1फिर वह दिरबे और लुस्‍त्रा में भी गया, और देखो, वहाँ तीमुथियुस नामक एक चेला था। उसकी माँ यहूदि विश्वासी थी, परन्‍तु उसका पिता यूनानी था।

2वह लुस्‍त्रा और इकुनियुम के भाइयों में सुनाम था।

3पौलुस की इच्छा थी कि वह मेरे साथ चले; और जो यहूदी लोग उन जगहों में थे उनके कारण उसे लेकर उसका खतना किया, क्‍योंकि वे सब जानते थे, कि उसका पिता यूनानी था।

4और नगर-नगर जाते हुए वे उन विधियों को जो यरूशलेम के प्रेरितों और प्राचीनों ने ठहराई थीं, मानने के लिये उन्‍हें पहुँचाते जाते थे।

5इस प्रकार कलीसियाएँ विश्‍वास में स्‍थिर होती गई और गिनती में प्रतिदिन बढ़ती गई।

6और वे फ्रूगिया और गलातिया प्रदेशों में से होकर गए, क्योंकि पवित्र आत्‍मा ने उन्‍हें एशिया में वचन सुनाने से मना किया।

7और उन्होंने मूसिया के निकट पहुँचकर, बितूनिया में जाना चाहा; परन्‍तु यीशु के आत्‍मा ने उन्‍हें जाने न दिया।

8अतः वे मूसिया से होकर त्रोआस में आए।

9वहाँ पौलुस ने रात को एक दर्शन देखा कि एक मकिदुनी पुरूष खड़ा हुआ, उससे विनती करके कहता है, “पार उतरकर मकिदुनिया में आ, और हमारी सहायता कर।”

10उसके यह दर्शन देखते ही हम ने तुरन्‍त मकिदुनिया जाना चाहा, यह समझकर कि परमेश्‍वर ने हमें उन्‍हें सुसमाचार सुनाने के लिये बुलाया है।

11इसलिये त्रोआस से जहाज खोलकर हम सीधे सुमात्रा और दूसरे दिन नियापुलिस में आए।

12वहाँ से हम फिलिप्‍पी में पहुँचे, जो मकिदुनिया प्रान्‍त का मुख्‍य नगर, और रोमियों की बस्‍ती है; और हम उस नगर में कुछ दिन तक रहे।

13सब्‍त के दिन हम नगर के फाटक के बाहर नदी के किनारे यह समझकर गए कि वहाँ प्रार्थना करने का स्‍थान होगा; और बैठकर उन स्‍त्रियों से जो इकट्ठी हुई थीं, बातें करने लगे।

14और लुदिया नाम थुआथीरा नगर की बैंजनी कपड़े बेचनेवाली एक भक्‍त स्‍त्री सुन रही थी, और प्रभु ने उसका मन खोला, ताकि पौलुस की बातों पर ध्यान लगाए।

15और जब उसने अपने घराने समेत बपतिस्‍मा लिया, तो उसने विनती की, “यदि तुम मुझे प्रभु की विश्‍वासिनी समझते हो, तो चलकर मेरे घर में रहो,” और वह हमें मनाकर ले गई।

16जब हम प्रार्थना करने की जगह जा रहे थे, तो हमें एक दासी मिली जिसमें भावी कहनेवाली आत्‍मा थी; और भावी कहने से अपने स्‍वामियों के लिये बहुत कुछ कमा लाती थी।

17वह पौलुस के और हमारे पीछे आकर चिल्‍लाने लगी, “ये मनुष्‍य परम प्रधान परमेश्‍वर के दास हैं, जो हमें उद्धार के मार्ग की कथा सुनाते हैं।”

18वह बहुत दिन तक ऐसा ही करती रही, परन्‍तु पौलुस दुखी हुआ, और मुड़करउस आत्‍मा से कहा, “मैं तुझे यीशु मसीह के नाम से आज्ञा देता हूँ, कि उसमें से निकल जा और वह उसी घड़ी निकल गई।”

19जब उसके स्‍वामियों ने देखा, कि हमारी कमाई की आशा जाती रही, तो पौलुस और सीलास को पकड़ कर चौक में प्रधानों के पास खींच ले गए।

20और उन्‍हें फौजदारी के हाकिमों के पास ले जाकर कहा, “ये लोग जो यहूदी हैं, हमारे नगर में बड़ी हलचल मचा रहे हैं;

21और ऐसी रीतियाँ बता रहे हैं, जिन्‍हें ग्रहण करना या मानना हम रोमियों के लिये ठीक नहीं।

22तब भीड़ के लोग उनके विरोध में इकट्ठे होकर चढ़ आए, और हाकिमों ने उनके कपड़े फाड़कर उतार डाले, और उन्‍हें बेंत मारने की आज्ञा दी।

23और बहुत बेंत लगवाकर उन्होंने उन्‍हें बन्‍दीगृह में डाल दिया और दरोगा को आज्ञा दी कि उन्‍हें चौकसी से रखे।

24उसने ऐसी आज्ञा पाकर उन्‍हें भीतर की कोठरी में रखा और उनके पाँव काठ में ठोंक दिए।

25आधी रात के लगभग पौलुस और सीलास प्रार्थना करते हुए परमेश्‍वर के भजन गा रहे थे, और कैदी उनकी सुन रहे थे।

26कि इतने में अचानक एक बड़ा भूकम्प हुआ, यहाँ तक कि बन्‍दीगृह की नीव हिल गईं, और तुरन्‍त सब द्वार खुल गए; और सब के बन्‍धन खुल गए।

27और दरोगा जाग उठा, और बन्‍दीगृह के द्वार खुले देखकर समझा कि कैदी भाग गए, अतः उसने तलवार खींचकर अपने आपको मार डालना चाहा।

28परन्‍तु पौलुस ने ऊँचे शब्‍द से पुकारकर कहा, “अपने आप को कुछ हानि न पहुँचा, क्‍योंकि हम सब यहीं हैं।”

29तब वह दीया मँगवाकर भीतर लपका और काँपता हुआ पौलुस और सीलास के आगे गिरा;

30और उन्‍हें बाहर लाकर कहा, “हे सज्जनों, उद्धार पाने के लिये मैं क्‍या करूँ?”

31उन्होंने कहा, “प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।”

32और उन्होंने उसको और उसके सारे घर के लोगों को प्रभु का वचन सुनाया।

33और रात को उसी घड़ी उसने उन्‍हें ले जाकर उनके घाव धोए, और उसने अपने सब लोगों समेत तुरन्‍त बपतिस्‍मा लिया।

34और उसने उन्‍हें अपने घर में ले जाकर, उनके आगे भोजन रखा और सारे घराने समेत परमेश्‍वर पर विश्‍वास करके आनन्‍द किया।

35जब दिन हुआ तक हाकिमों ने सिपाहियों के हाथ कहला भेजा कि उन मनुष्‍यों को छोड़ दो।

36दरोगा ने ये बातें पौलुस से कह सुनाई, “हाकिमों ने तुम्‍हारे छोड़ देने की आज्ञा भेज दी है, इसलिये अब निकलकर कुशल से चले जाओ।”

37परन्‍तु पौलुस ने उससे कहा, “उन्होंने हमें जो रोमी मनुष्‍य हैं, दोषी ठहाराए बिना लोगों के सामने मारा और बन्‍दीगृह में डाला, और अब क्‍या चुपके से निकाल देते हैं? ऐसा नहीं, परन्‍तु वे आप आकर हमें बाहर ले जाएँ।”

38सिपाहियों ने ये बातें हाकिमों से कह दीं, और वे यह सुनकर कि रोमी हैं, डर गए,

39और आकर उन्‍हें मनाया, और बाहर ले जाकर विनती की कि नगर से चले जाएँ।

40वे बन्‍दीगृह से निकल कर लुदिया के यहाँ गए, और भाइयों से भेंट करके उन्‍हें शान्‍ति दी, और चले गए।

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