Acts 12017

1हे थियुफिलुस, मैंने पहली पुस्‍तिका उन सब बातों के विषय में लिखी, जो यीशु ने आरम्‍भ किया और करता और सिखाता रहा,

2उस दिन तक जब वह उन प्रेरितों को जिन्‍हें उसने चुना था, पवित्र आत्‍मा के द्वारा आज्ञा देकर ऊपर उठाया न गया।

3और उसने दु:ख उठाने के बाद बहुत से पक्‍के प्रमाणों से अपने आप को उन्‍हें जीवित दिखाया, और चालीस दिन तक वह उन्‍हें दिखाई देता रहा, और परमेश्‍वर के राज्‍य की बातें करता रहा।

4और चेलों से मिलकर उन्‍हें आज्ञा दी, “यरूशलेम को न छोड़ो, परन्‍तु पिता की उस प्रतिज्ञा के पूरे होने की बाट जोहते रहो, जिसकी चर्चा तुम मुझ से सुन चुके हो।

5क्‍योंकि यूहन्‍ना ने तो पानी में बपतिस्‍मा दिया है परन्‍तु थोड़े दिनों के बाद तुम पवित्रात्‍मा से बपतिस्‍मा पाओगे।”

6अतः उन्होंने इकट्ठे होकर उससे पूछा, “हे प्रभु, क्‍या तू इसी समय इस्राएल का राज्‍य पुनः स्थापित करेगा?”

7उसने उनसे कहा, “उन समयों या कालों को जानना, जिनको पिता ने अपने ही अधिकार में रखा है, तुम्‍हारा काम नहीं।

8परन्‍तु जब पवित्र आत्‍मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्‍वी की छोर तक मेरे गवाह होंगे।”

9यह कहकर वह उनके देखते-देखते ऊपर उठा लिया गया, और बादल ने उसे उनकी आँखों से छिपा लिया।

10और उसके जाते समय जब वे आकाश की ओर ताक रहे थे, तो देखो, दो पुरूष श्‍वेत वस्‍त्र पहने हुए उनके पास आ खड़े हुए।

11और कहने लगे, “हे गलीली पुरूषों, तुम क्‍यों खड़े स्‍वर्ग की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्‍हारे पास से स्‍वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्‍वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा।”

12तब वे जैतून नामक पहाड़ से जो यरूशलेम के निकट एक सब्त के दिन की दूरी पर है, यरूशलेम को लौटे।

13और जब वहाँ पहुँचे तो वे उस अटारी पर गए, जहाँ पतरस और यूहन्‍ना और याकूब और अन्‍द्रियास और फिलिप्‍पुस और थोमा और बरतुल्मै और मत्ती और हलफई का पुत्र याकूब और शमौन जेलोतेस और याकूब का पुत्र यहूदा रहते थे।

14ये सब कई स्‍त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाइयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे रहे।

15और उन्‍हीं दिनों में पतरस भाइयों के बीच में जो एक सौ बीस व्यक्ति के लगभग इकट्ठे थे, खड़ा होकर कहने लगा।

16“हे भाइयों, अवश्‍य था कि पवित्र शास्‍त्र का वह लेख पूरा हो, जो पवित्र आत्‍मा ने दाऊद के मुख से यहूदा के विषय में जो यीशु के पकड़ने वालों का अगुवा था, पहले से कहा था।

17क्‍योंकि वह तो हम में गिना गया, और इस सेवकाई में भी सहभागी हुआ।

18(उसने अधर्म की कमाई से एक खेत मोल लिया; और सिर के बल गिरा, और उसका पेट फट गया, और उसकी सब अं‍तड़ियाँ निकल गई।

19और इस बात को यरूशलेम के सब रहनेवाले जान गए, यहाँ तक कि उस खेत का नाम उनकी भाषा में ‘हकलदमा’ अर्थात् ‘लहू का खेत’ पड़ गया।)

20क्‍योंकि भजन संहिता में लिखा है, “उसका घर उजड़ जाए, और उसमें कोई न बसे और उसका पद कोई दूसरा ले ले।”

21इसलिये जितने दिन तक प्रभु यीशु हमारे साथ आता जाता रहा, अर्थात् यूहन्‍ना के बपतिस्‍मा से लेकर उसके हमारे पास से उठाए जाने तक, जो लोग बराबर हमारे साथ रहे,

22उचित है कि उनमें से एक व्यक्ति हमारे साथ उसके जी उठने का गवाह हो जाए।”

23तब उन्होंने दो को खड़ा किया, एक यूसुफ को, जो बर-सबा कहलाता है, जिसका उपनाम यूसतुस है, दूसरा मत्तियाह को।

24और यह कहकर प्रार्थना की, “हे प्रभु, तू जो सब के मन को जानता है, यह प्रगट कर कि इन दोनों में से तूने किस को चुना है,

25कि वह इस सेवकाई और प्रेरिताई का पद ले जिसे यहूदा छोड़ कर अपने स्‍थान को गया।”

26तब उन्होंने उनके बारे में चिट्ठियाँ डालीं, और चिट्ठी मत्तियाह के नाम पर निकली, अतः वह उन ग्‍यारह प्रेरितों के साथ गिना गया।

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