2 Corinthians 112017

1यदि तुम मेरी थोड़ी मूर्खता सह लेते तो क्‍या ही भला होता; हाँ, मेरी सह भी लेते हो।

2क्‍योंकि मैं तुम्‍हारे विषय में ईश्‍वरीय धुन लगाए रहता हूँ, इसलिये कि मैं ने एक ही पुरूष से तुम्‍हारी बात लगाई है, कि तुम्‍हें पवित्र कुँवारी की नाई मसीह को सौंप दूँ।

3परन्‍तु मैं डरता हूँ कि जैसे साँप ने अपनी चतुराई से हव्‍वा को बहकाया, वैसे ही तुम्‍हारे मन उस सीधाई और पवित्रता से जो मसीह के साथ होनी चाहिए कहीं भ्रष्‍ट न किए जाएँ।

4यदि कोई तुम्‍हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिसका प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्‍मा तुम्‍हें मिले; जो पहले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहले न माना था, तो तुम्‍हारा सहना ठीक होता।

5मैं तो समझता हूँ, कि मैं किसी बात में बड़े से बड़े प्रेरितों से कम नहीं हूँ।

6यदि मैं वक्तव्य में अनाड़ी हूँ, तौभी ज्ञान में नहीं; वरन् हम ने इस को हर बात में सब पर तुम्‍हारे लिये प्रगट किया है।

7क्‍या इस में मैं ने कुछ पाप किया; कि मैं ने तुम्‍हें परमेश्‍वर का सुसमाचार सेंत मेंत सुनाया; और अपने आप को नीचा किया, कि तुम ऊँचे हो जाओ?

8मैं ने और कलीसियाओं को लूटा अर्थात् मैं ने उनसे मजदूरी ली, ताकि तुम्‍हारी सेवा करूँ।

9और जब तुम्‍हारे साथ था, और मुझे घटी हुई, तो मैं ने किसी पर भार नहीं दिया, क्‍योंकि भाइयों ने, मकिदुनिया से आकर मेरी घटी को पूरी की: और मैं ने हर बात में अपने आप को तुम पर भार होने से रोका, और रोके रहूँगा।

10यदि मसीह की सच्‍चाई मुझ में है, तो अखया देश में कोई मुझे इस घमण्‍ड से न रोकेगा।

11किस लिये? क्‍या इसलिये कि मैं तुम से प्रेम नहीं रखता? परमेश्‍वर यह जानता है।

12परन्‍तु जो मैं करता हूँ, वही करता रहूँगा; कि जो लोग दाँव ढूँढ़ते हैं, उन्‍हें मैं दाँव पाने दूं, ताकि जिस बात में वे घमण्‍ड करते हैं, उसमें वे हमारे ही समान ठहरें।

13क्‍योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करनेवाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरनेवाले हैं।

14और यह कुछ अचम्‍भे की बात नहीं क्‍योंकि शैतान आप भी ज्‍योतिमर्य स्‍वर्गदूत का रूप धारण करता है।

15सो यदि उसके सेवक भी धर्म के सेवकों का सा रूप धरें, तो कुछ बड़ी बात नहीं परन्‍तु उन का अन्‍त उनके कामों के अनुसार होगा।

16मैं फिर कहता हूँ, कोई मुझे मूर्ख न समझे; नहीं तो मूर्ख ही समझकर मेरी सह लो, ताकि थोड़ा सा मैं भी घमण्‍ड न कर सँकू।

17इस बेधड़क घमण्‍ड से बोलने में जो कुछ मैं कहता हूँ वह प्रभू की आज्ञा के अनुसार** नहीं पर मानों मूर्खता से ही कहता हूँ।

18जब कि बहुत लोग शरीर के अनुसार घमण्‍ड करते हैं, तो मैं भी घमण्‍ड करूँगा।

19तुम तो समझदार होकर आनन्‍द से मूर्खों की सह लेते हो।

20क्‍येांकि जब तुम्‍हें कोई दास बना लेता है, या खा जाता है, या फँसा लेता है, या अपने आप को बड़ा बनाता है, या तुम्‍हारे मुँह पर थप्‍पड़ मारता है, तो तुम सह लेते हो।

21मेरा कहना अनादर की रीति पर है, मानो कि हम निर्बल से थे; परन्‍तु जिस किसी बात में कोई हियाव करता है (मैं मूर्खता से कहता हूँ) तो मैं भी हियाव करता हूँ।

22क्‍या वे ही इब्रानी हैं? मैं भी हूँ: क्‍या वे ही इस्राएली हैं? मैं भी हूँ; क्‍या वे ही अब्राहम के वंश के हैं? मैं भी हूँ:

23क्‍या वे ही मसीह के सेवक हैं? (मैं पागल की नाई कहता हूँ) मैं उनसे बढ़कर हूँ! अधिक परिश्रम करने में; बार बार कैद होने में; कोड़े खाने में; बार बार मृत्‍यु के जोखिमों में।

24पाँच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्‍तालीस उन्‍तालीस कोड़े खाए।

25तीन बार मैं ने बेंते खाई; एक बार पत्‍थरवाह किया गया; तीन बार जहाज जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा।

26मैं बार बार यात्राओं में; नदियों के जोखिमों में; डाकुओं के जोखिमों में; अपने जातिवालों से जोखिमों में; अन्‍यजातियों से जोखिमों में; नगरों में के जोखिमों में; जंगल के जोखिमों में; समुद्र के जोखिमों में; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में रहा;

27परिश्रम और कष्‍ट में; बार बार जागते रहने में; भूख-पियास में; बार बार उपवास करने में; जाड़े में; उघाड़े रहने में।

28और अन्य बातों को छोड़कर जिनका वर्णन मैं नहीं करता सब कलीसियाओं की चिन्‍ता प्रतिदिन मुझे दबाती है।

29किस की निर्बलता से मैं निर्बल नहीं होता? किस के ठोकर खाने से मेरा जी नहीं दुखता?

30यदि घमण्‍ड करना अवश्‍य है, तो मैं अपनी निर्बलता की बातों पर करूँगा।

31प्रभु यीशु का परमेश्‍वर और पिता जो सदा धन्‍य है, जानता है, कि मैं झूठ नहीं बोलता।

32दमिश्‍क में अरितास राजा की ओर से जो हाकिम था, उसने मेरे पकड़ने को दमिश्कियों के नगर पर पहरा बैठा रखा था।

33और मैं टोकरे में खिड़की से होकर भीत पर से उतारा गया, और उसके हाथ से बच निकला।

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