1 John 32017

1देखो पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्‍वर की सन्‍तान कहलाएँ, और हम हैं भी: इस कारण संसार हमें नहीं जानता, क्‍योंकि उसने उसे भी नहीं जाना।

2हे प्रियों, अभी हम परमेश्‍वर की सन्‍तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्‍या कुछ होंगे! इतना जानते हैं, कि जब वह प्रगट होगा तो हम भी उसके समान होंगे, क्‍योंकि उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है।

3और जो कोई उस पर यह आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है, जैसा वह पवित्र है।

4जो कोई पाप करता है, वह व्‍यवस्‍था का विरोध करता है; और पाप तो व्‍यवस्‍था का विरोध है।

5और तुम जानते हो, कि वह इसलिये प्रगट हुआ, कि पापों को हर ले जाए; और उसके स्‍वभाव में पाप नहीं।

6जो कोई उसमें बना रहता है, वह पाप नहीं करता: जो कोई पाप करता है, उसने न तो उसे देखा है, और न उसको जाना है।

7हे बालको, किसी के भरमाने में न आना; जो धर्म के काम करता है, वही उसकी नाई धर्मी है।

8जो कोई पाप करता है, वह शैतान की ओर से है, क्‍योंकि शैतान आरम्‍भ ही से पाप करता आया है: परमेश्‍वर का पुत्र इसलिये प्रगट हुआ, कि शैतान के कामों को नाश करे।

9जो कोई परमेश्‍वर से जन्‍मा है वह पाप नहीं करता; क्‍योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है: और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्‍योंकि परमेश्‍वर से जन्‍मा है।

10इसी से परमेश्‍वर की सन्‍तान, और शैतान की सन्‍तान जाने जाते हैं; जो कोई धर्म के काम नहीं करता, वह परमेश्‍वर से नहीं, और न वह, जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता।

11क्‍योंकि जो समाचार तुम ने आरम्‍भ से सुना, वह यह है, कि हम एक दूसरे से प्रेम रखे।

12और कैन के समान न बनें, जो उस दुष्‍ट से था, और जिस ने अपने भाई को घात किया? और उसे किस कारण घात किया? इस कारण कि उसके काम बुरे थे, और उसके भाई के काम धर्म के थे।

13हे भाइयों, यदि संसार तुम से बैर करता है तो अचम्‍भा न करना।

14हम जानते हैं, कि हम मृत्‍यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं; क्‍योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं: जो प्रेम नहीं रखता, वह मृत्‍यु की दशा में रहता है।

15जो कोई अपने भाई से बैर रखता है, वह हत्‍यारा है; और तुम जानते हो, कि किसी हत्‍यारे में अनन्‍त जीवन नहीं रहता।

16हम ने प्रेम इसी से जाना, कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए।

17पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देखकर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उसमें परमेश्‍वर का प्रेम क्‍योंकर बना रह सकता है?

18हे बालको, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्‍य के द्वारा भी प्रेम करें।

19इसी से हम जानेंगे, कि हम सत्‍य के हैं; और जिस बात में हमारा मन हमें दोष देगा, उस विषय में हम उसके साम्‍हने अपने अपने मन को ढाढ़स दे सकेंगे।

20क्‍योंकि परमेश्‍वर हमारे मन से बड़ा है; और सब कुछ जानता है।

21हे प्रियो, यदि हमारा मन हमें दोष न दे, तो हमें परमेश्‍वर के साम्‍हने हियाव होता है।

22और जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है; क्‍योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं; और जो उसे भाता है वही करते हैं।

23और उसकी आज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्‍वास करें और जैसा उसने हमें आज्ञा दी है उसी के अनुसार आपस में प्रेम रखें।

24और जो उसकी आज्ञाओं को मानता है, वह इस में, और यह उसमें बना रहता है: और इसी से, अर्थात् उस आत्‍मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है।

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